नागरिक समाज और लोकतंत्र में सम्बन्ध-नागरिक समाज को यदि ध्यान से देखा जाए, तो यह लोकतंत्र की रीढ़ है। कुछ परिस्थितियों में नागरिक समाज सत्तावादी शासन को लोकतांत्रिक शासन बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है और यदि एक बार लोकतांत्रिक शासन की स्थापना हो जाती है, तो उसे जीवित रखने में भी सहायता करता है। जैसा कि पूर्वी यूरोप के देशों, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस में नागरिकों ने नागरिक समाज की संस्थाओं का प्रयोग राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए लाखों नागरिकों को दमनकारी शासकों के विरुद्ध एकजुट कर संघर्ष किया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक समाज की संस्थाएँ नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में संयुक्त हितों को प्राप्त करने के लिए आधार प्रदान करती है। यहाँ पर लोग स्वतंत्र सामूहिक और शान्तिपूर्ण ढंग से भागीदारी करते हैं। इससे लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा मिलती है, जिन्हें वे अपने समुदाय के लोगों के बीच प्रसारित करते हैं। नागरिक समाज का आन्दोलन सरकारी नीति और सामाजिक प्रवृत्ति को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है। इनकी स्वतंत्र गतिविधियाँ राज्य शक्ति के बराबर हो सकती हैं।
कैरोथर्स ने अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में जाये बिना अपनी पुस्तक ‘एडिंग डेमोक्रेसी एब्राड’ में लोकतन्त्र के विस्तार की एक रणनीति के रूप में चर्चा की है जो यथार्थवादी सुरक्षा हितों अथवा आदर्शवादी मानवीय प्रेरणा के अनुरूप है। वह यह दावा करता है कि लोकतंत्र वास्तव में दोनों का मिश्रण है। उसने लोकतंत्र की सहायता के लिए तीन प्रमुख केन्द्रीय प्रश्नों की चर्चा की है-चुनावी सहायता, संस्थात्मक सुधार और नागरिक समाज सहायता। उसके विचार में लोकतंत्र सहायता लोकतंत्रीकरण की देन है। लोकतांत्रिक होते राज्यों से बने वातावरण और परिस्थितियों ने इन देशों को बढ़ाने में अन्तर्राष्ट्रीय सहायता के योगदान को सम्भव बनाया है।
निष्कर्ष के रूप में वह कहता है कि स्थानीय सन्दर्भो में अन्तर होने के बावजूद लोकतंत्र को बढ़ाने के लिए अमेरिका की गतिविधियाँ सबके लिए एक ही नीति का प्रयोग करती हैं,जो कोई स्वस्थ तरीका नहीं है। लोकतंत्र की सहायता का यह तरीका शैक्षणिक सिद्धान्तों के सतर्क प्रयोग नहीं होकर व्यवहार के दौरान विकसित हुआ है। यद्यपि दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिका के हस्तक्षेप का समर्थन नहीं किया जा सकता है, फिर भी विद्वानों में इस बात की सहमति है कि लोकतंत्र को स्थापित करने में नागरिक समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रथम स्थान है। जॉन केन के अनुसार जहाँ कोई नागरिक समाज नहीं है, वहाँ एक राजनीतिक कानूनी ढाँचे के अन्तर्गत अपनी विशिष्टता, अधिकार और कर्त्तव्यों को चुनने योग्य नागरिक नहीं हो सकते।
लोकतंत्र में नागरिक समाज की भूमिका :
लोकतंत्र में नागरिक समाज की भूमिका या कार्य पर प्रकाश डालते हुए लारी डायमण्ड ने अपनी पुस्तक ” रिथिंकिग सिविल सोसाइटी” में उल्लेख किया है कि नागरिक समाज लोकतंत्र को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसका विचार है कि लोकतांत्रिक समाज में इस प्रकार की संभावनाएं अधिक हैं कि लोकतंत्र का उदय होगा और वह स्थायी होगा। डायमंड के अनुसार नागरिक समाज के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य हैं
1. राज्य के राजनीतिक दुर्व्यवहार और कानूनी उल्लंघन को रोक कर जनता द्वारा इसकी छानबीन करके राज्य शक्ति को सीमित करना।
2. नागरिक के अधिकारों में वृद्धि करके तथा लोकतंत्र राजनीतिक कुशलता एवं कौशल में वृद्धि करके नागरिकों को शक्तिशाली बनाना
3. नागरिकों में लोकतांत्रिक गुणों, जैसे-सहनशीलता, विनम्रता, समझौता करने की इच्छा, विरोधी विचारों को सम्मान देने की भावना पैदा करना एवं उन्हें विस्तार देना।
4. राजनीतिक दलों एव अन्य संस्थाओं को अपने हितों को प्रस्तुत करने के लिए अवसर प्रदान करना।
5. भर्ती करने, सूचना प्रदान करने एवं नेतृत्व करने वाली एजेन्सी के रूप में कार्य करना।
6. एक ठोस आधार वाला नागरिक समाज झटके सहन करने में सक्षम होता है।
7. एक मजबूत आधार वाला नागरिक समाज नये राजनीतिक नेतृत्व की पहचान करके उसे प्रशिक्षित करता है।
8. सफल आर्थिक एवं राजनीतिक सुधारों को प्रारम्भ करना जिसके लिये समाज और विधायिका में गठबंधनों के सहयोग की _ आवश्यकता होती है।
9. अनेक गैर-राजनीतिक संस्थाएँ देश-विदेश में चुनावी निगरानी का कार्य करती हैं।
10. रॉबर्ट डहल के अनुसार सरकार के ठीक ढंग से कामकाज करने के लिए नागरिक समाज में निम्नलिखित सांस्थानिक गारंटी सुनिश्चित करनी चाहिए
(i) सभा एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
(ii) मतदान का अधिकार।
(iii) सरकारी पदों के लिए प्रतियोगिता।
(iv) निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव।
(v) समर्थन एवं मतों के लिए मुकाबले का राजनीतिक अधिकार।
(vi) सूचना के वैकल्पिक स्रोत।
(vii) नीति-निर्माण के लिए संस्थाओं का मतों पर निर्भर होना।
(viii) प्राथमिकताओं की अन्य अभिव्यक्तियाँ। यद्यपि नागरिक समाज और लोकतंत्र के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं।
नकारात्मक पहलुओं को यदि छोड़ दिया जाए तो कुछ ऐसे नागरिक समाज के पहलू हैं, जो लोकतंत्र को विकसित करने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं; जैसे
1. जनशिक्षा-जागरूकता लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है। जनता को शिक्षित करने के द्वारा नागरिक समाज लोकतंत्र को बढ़ावा दे सकता है। नागरिक संस्थाएँ विश्वभर में प्रचलित कानूनों और नियामक संस्थाओं के प्रति जागरूकता पैदा करने के माध्यम से अत्यधिक योगदान कर सकती हैं। ज्ञानवान नागरिक ही प्रभावी लोकतन्त्र को जीवित रख सकते हैं। नागरिक समाज पुस्तिकाएँ, दृश्य-श्रव्य सामग्री,कार्यशालाएँ, समाचारपत्र आदि के माध्यम से सूचनाएँ दे सकते हैं तथा उनका ध्यान आकर्षित कर सकते हैं।
2. नागरिक समाज दावदारों को समर्थन प्रदान करके लोकतांत्रिक शासन को बढ़ावा देता है। नागरिक संस्थाएँ वंचित एवं तिरस्कृत सामाजिक वर्ग, जैसे-गरीब, महिलाओं और अक्षम- अपंग लोगों की आवाज बन सकती हैं, जिनकी प्रायः उनके द्वारा चुनी गयी विधायिका और कार्यपालिका के सदस्यों द्वारा एवं माध्यमों से थोड़ी कम सुनवाई हो पाती है। इस प्रकार नागरिक सक्रियता दावेदारों को शक्ति प्रदान कर सकती है तथा राजनीति में अधिकतम सहभागिता में वृद्धि कर सकती है।
3. सरकारी नीतियों के निर्माण में घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर नागरिक समाज के निवेश से अधिक प्रभाव पड़ता है जैसे कि नागरिकों के समूह कथित ‘वाशिंगटन समिति’ के प्रति बहस की चिंगारी भड़काने में आगे थे। उन्होंने निरन्तर पर्यावरण सन्तुलन सम्बन्धी मुद्दों को उठाया, गरीबी का गुणात्मक आकलन करके ऋण कटौती करने के लिए दबाव बनाया।
4. सतर्क नागरिकों का एकजुट होना शासन में पारदर्शिता का कारण बन सकता है। नागरिक समाज द्वारा डाला गया निरन्तर दबाव, नियम के ढाँचे और क्रियाकलापों को उजगर करता है, जहाँ पर जनता की निगरानी और दृष्टि में उनका आकलन करना सम्भव हो सकता है। सामान्यतया नागरिकों में इस प्रकार की जागरूकता का अभाव होता है कि सरकार क्या निर्णय लेती है? कौन निर्णय लेता है? एवं किस उद्देश्य के लिए निर्णय लिये जाते हैं? नागरिक समाज अपने सुसंगठित ढाँचे के द्वारा पारदर्शिता पर लगायी जाने वाली वैधता पर प्रश्न कर | सकता है कि किसे, कब, किसके हित में क्या पारदर्शी बनाया गया है?
5. जनता के प्रति जवाबदेही कई सम्बन्धित एजेंसियों को उत्तरदायी बना सकती है। नागरिक समूह जनता और सम्बन्धित नीतियों को लागू करने तथा उनके प्रभाव पर नजर रख सकते हैं, यदि उसके परिणाम विपरीत आ रहे हैं। स्वतंत्र नागरिक एजेंसियाँ विश्व बैंक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मूल्यांकन की एक निष्पक्ष नीति रखती हैं। फलस्वरूप उन्होंने अल्पविकसित देशों के प्रति इन एजेंसियों की नीति की अधिकतर आलोचना की है।
6. नागरिक समाज उपर्युक्त सभी गतिविधियों के द्वारा एक वैध लोकतांत्रिक शासन की स्थापना में योगदान देता है तथा जब लोगों की यह स्वीकृति प्राप्त हो जाती है कि एक शक्ति को शासन करने का अधिकार है तथा उनका इन निर्देशों का पालन करने का कर्त्तव्य है, तो शासन वैध कहलाता है। इस प्रकार की सहमति का परिणाम यह होता है कि वैध शासन अवैध शासन और तानाशाही शासन की तुलना में अधिक सरल, उत्पादक और अहिंसक ढंग से कार्य करता है। इन सब सकारात्मक पहलुओं के अलावा नागरिक समाज लोकतंत्र के लिए कभी खतरा भी बन सकता है। यदि नागरिक समाज की गतिविधियाँ लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत हों,
यदि ठीक से नागरिक समाज के क्रियान्वयन की नीतियाँ ठीक से न बनायी जाएँ, सरकारी एजेंसियाँ नागरिक समाज से प्राप्त जानकारियों को संभाल नहीं पातीं। इसके अलावा नागरिक संस्थाओं का भ्रष्ट होना, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व, नागरिक समाज में आन्तरिक लोकतंत्र के अभाव आदि ऐसे कारक हैं, जो लोकतंत्र को विघटित कर सकते हैं। इन तमाम नकारात्मक पहलुओं पर यदि थोड़ा-सा नियंत्रण कर लिया जाए, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि नागरिक समाज, लोकतंत्र के उद्भव एवं विकास के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, या हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र के प्रवर्तक के रूप में नागरिक समाज की महती भूमिका है।
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