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आप सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपीय संकट से क्‍या समझते हैं? इस संकट की उत्पत्ति के बारे में चर्चा कीजिए।

 प्रत्येक इतिहासकार का संकट की तिथि तथा प्रबलता के बारे में पृथक मत हैं जो एक क्षेत्र से दसरे क्षेत्र पर निर्भर करता है। उस विषय के बारे में आम मान्यता है कि यूरोपीय संकट सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में विकसित हुआ। कुछ समकालीन विद्वान उपद्रवों और विद्रोहों की लम्बी सूची प्रस्तुत करते हैं जिससे शहरी अर्थव्यवस्था और व्यापार में संकट उत्पन्न हुआ जिसके फलस्वरूप आर्थिक मंदी, जनसंख्या में गिरावट, सामाजिक अशान्ति और व्यापक पैमाने पर युद्ध हुए।

अस्सी वर्षीय काल (1582-1662) ने परे नीदरलैंडस में स्पेन के शासन के विरुद्ध जगह-जगह उपद्रव अनुभव किए गये। इसका प्रभाव यूरोप के अन्य क्षेत्रों पर भी महसूस किया गया। तीस वर्षीय युद्ध (1618-1648) ने मध्य यूरोप के कई राज्यों में, फ्रांस तथा स्पेन में विध्वंस फैलाया। फ्रांस में विद्रोहों और उपद्रवों का निरन्तर सिलसिला आरम्भ हुआ जिसकी शुरुआत आकीतेन प्रान्त में गाबेल (नमक) कर के विरुद्ध हुई। सन् 1590 और 1620 के दशकों में व्यापक कृषक विद्रोह, न्यू पिओद (1637) तथा सम्पूर्ण आन्तरायिक क्रोकुआन्त कृषक विद्रोहों ने फ्रैंच शासकों के लिए गंभीर समस्या उत्पन्न कर दी थी।

नू पीओद कर – विरोधी विद्रोह था जो नौरमांदी में हुआ। एक अन्य विद्रोह पेरीगम में भड़का जिसमें 30,000 से अधिक सशस्त्र किसानों ने विद्रोह किया जो राजा के विरुद्ध न होकर अधिक कर तथा सरकारी कर तथा अधिकारियों के विरोध में था।  फ्रोन्द (1647-1652) मुख्य राजनीतिक आन्दोलन था जिससे फ्रांस में गहरे सामाजिक संकट की मौजूदगी का अहसास होता है। फ्रोन्द विद्रोह में फ्रांस के निरंकुश शासकों की बढ़ती हुई शक्ति का विरोध किया गया। इसलिए विद्रोहकारी कुलीन वर्ग ने पार्लेमा (प्रशासनिक तथा न्यायिक संस्था) की शक्तियों को मजबूत बनाने का प्रयत्न किया जिससे वो सर्वोच्च संस्था बन जाए।

लेकिन यह विद्रोह असफल हो गया और उसके उपरान्त बूरबाँ वंश ने न केवल अपनी स्थिति सुधार ली बल्कि लुई XIV के शासन में अपने निरंकुश शासन को और सशक्त कर लिया। लगभग इसी समय इंग्लैंड भी गृहयुद्ध (1642-49) में फंसा था जिसमें स्टुअर्ट वंश के शासक चार्लस I को संसद के समर्थकों द्वारा फांसी दी गयी। तत्पश्चात्, 1660 तक राजनीतिक प्रयोग चलते रहे परन्तु राजनीतिक विवाद 1688-89 की क्रांति तक नहीं सुलझाए जा सके। बोरिस पोर्चनेब ने फ्रांस के फ्रोन्द विद्रोह को इंग्लैंड की 1640 की बुर्जुवा क्रांति के रूपान्तर के रूप में प्रस्तुत किया है और 1789 की क्रांति का अवसान माना है।

इसी काल में भूमध्यसागर के क्षेत्र में भी कई विद्रोह हुए। इसमें कैतालोनिया, नेपल्स तथा पुर्तगाल के विद्रोह शामिल हैं, जिन्होंने स्पेन के साम्राज्य में संकट उत्पन्न किया। स्पेन में 1640 के दशक का कृषक विद्रोह बार्सेलोना में फैला, कस्तीलवासियों को अपने क्षेत्र से बाहर निकालने का काम शुरू किया और वायसराय को मार दिया। इटली में नेपल्स विद्रोह (जुलाई 1647) खाद्य की कमी, करों का भार और प्रशासनिक अयोग्यता के कारण हुआ था। थोड़े समय के लिए नेपल्स् मसानिचेलो के नेतृत्व में और फ्रांस के संरक्षण में गणतंत्र बन गया परन्तु स्पेन ने उसे पुनः जीत कर लिया।

यूरोप कुछ अन्य भागों में इधर-उधर उपद्रव हुए जैसे कि स्विज़रलैंड में कृषक विद्रोह (1653), युकरेन विद्रोह (1648-54). रूस में विद्रोह (1672), हंगरी में कुरुओज़ आन्दोलन, आइरिश विद्रोह (1641 तथा 1689) तथा नीदरलैंडस् में राजमहल क्रांति। इस प्रकार क्रांतिकारी घटनाक्रम, राजनीतिक और सामाजिक प्रतिवाद के फलस्वरूप कई लेखक मानते हैं कि तमाम यूरोप में व्यापक संकट था, जिनकी उत्पत्ति अलग-अलग थी परन्तु इनमें कुछ समानताएँ भी नज़र आती हैं।

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