दलित आन्दोलन में दलित साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। दलित साहित्य का विरोध मानव-निर्मित भेदभावमूलक विचारधारा से था तथा उस धर्म से था, जो इसे अपरिवर्तनीय मानता था, जिसने सदियों तक मानव के एक समूह को ज्ञान की रोशनी से वंचित रखा । दलितों की इसी पीड़ा को प्रचारित करने के लिए दलित रचनाकार मुखर होकर लिख रहे हैं। दलित रचनाकार शोषकपूर्ण संस्कृति अस्वीकार करते हैं।
दलित साहित्य ने धर्मग्रंथों द्वारा स्थापित सामाजिक संरचना को अस्वीकार कर दिया है। दलित साहित्य ने सार्वजनिक तौर पर पुरोहितवाद का विरोध दर्ज कराया है। दलित साहित्य के अनुसार मनुष्यों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटने के लिए ही मनुस्मति की रचना की गयी थी। दलित वर्ग इस तथ्य से अच्छी तरह परिचित हो चुका है। इसलिए दलित लेखक ऐसे ग्रंथों को नकारते हैं तथा उनके अस्तित्व को नष्ट करने का प्रयास करते हैं।
दलित लेखन ने परिवर्तन की राह पर अकेले ही चलना स्वीकार किया है, क्योंकि वह जानता है कि दलित जीवन को उपहास बनाने वाली विचारधारा पर अन्य लोगों का विश्वास है। सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि कस्बों-गाँवों में दलित बस्तियाँ अलग-अलग हैं तथा इन बस्तियों के साथ गाँव के लोगों का व्यवहार बहुत कम है। गाँवों-कस्बों से रोजगार की तलाश में शहर आने वाला दलित वर्ग शहरों लोगों का व्यवहा में जगह न मिलने के कारण झग्गी बस्तियों में ही जीवन जीने को मजबूर हो जाता है। इस बदहाल जिन्दगी को जीने वाले अधिकतर दलित लोग शहरों में भी छुआछूत के शिकार होकर निम्न कार्यों में ही अपनी जिन्दगी गुजार लेते हैं।
मानवता को अपने पैरों तले कुचलने वाली परंपरावादी यथास्थितिवादी प्रवृतियों से निर्मित होने वाली संस्कृति को दलित साहित्य ने स्वीकार नहीं किया। अमानवीय एवं रूढ़िवादी मान्यताओं के विरोध में दलित साहित्य मुक्ति की चेतना द्वारा नए समाजशास्त्र को विकसित करने की प्रेरणा दे रहा है। दलित साहित्य घिनौने जीवन की तस्वीर प्रस्तुत करके मानवीय संवेदनाओं को विकसित करने का प्रयास करता है। दलित रचनाकारों की भूमिका दोहरी है, क्योंकि जाति – उन्मूलन द्वारा नए समतावादी समाज की रचना करने की प्रेरणा देना तो दलित रचनाकारों का कार्य है ही, साथ ही साथ दलित वर्ग को जागृत करने की जिम्मेदारी भी दलित रचनाकारों की ही है।
दलित साहित्य मानवीय मूल्य बोध के प्रसार द्वारा आत्मविश्वास का जगाकर भविष्य के प्रति आशान्वित करता है। दलित साहित्य पोथी-पुराणों द्वारा रची गयी संस्कृति के प्रभाव को स्वीकार नहीं करता। इसके बजाय दलित साहित्य क्रान्ति की ओर कदम बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है, जिसके कारण यह दलित आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा पाया। दलित साहित्य में प्रश्न उठाये गए हैं कि क्या वह संस्कृति महान हो सकती है, जो गर्भवती सीता को घर से बेघर करने वाली हो, शूद्रों को शिक्षा से वंचित करने वाली हो या ग्रंथों को स्पर्श न करने देने वाली हो ?
दलित साहित्य सामाजिक सरोकारों से करीब से जुड़कर दलितों की पीड़ा तथा वेदना को अभिव्यक्त करता है। दलित साहित्य अधिकार, स्वाधीनता, बंधता तथा न्याय के मूल्यों की अनदेखी को उजागर करके लोकतंत्र में प्राप्त स्वाधीनता के अधिकार को परिभाषित कर रहा है। दलित साहित्य का उद्देश्य है दलित समुदाय में जागति उत्पन्न करना, दलितों में स्वाभिमान की भावना भरना तथा अन्याय का विरोध करना। दलित साहित्य में पीड़ा एवं वेदना के शमन के उपाय भी बताये गये हैं।
दलित साहित्य का एक उद्देश्य यह भी है कि सदियों पुरानी संस्कृति को बदलकर एक समतावादी समाज की स्थापना के लिए समाज को प्रेरणा देना । साहित्य से आने वाले बदलाव का प्रभाव काफी दीर्घजीवी होता है। दलित साहित्य यह मानता है कि कलाकृति या रचना का सृजन पहले होता है, जबकि सौन्दर्यात्मक मूल्यों की जाँच-पड़ताल बाद में होती है। साहित्य सृजन दलित जीवन के यथार्थ को प्रतिबिम्बित करने का एक साधन है।
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