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भारत में शिक्षा के संदर्भ में सकारात्मक भेदमाव और सकारात्मक कार्रवाई के मुद॒दे की आलोचनात्मक जाँच कीजिए।

 सकारात्मक भेदभाव का अर्थ है-सुविधावंचित समूहों के सदस्यों का पक्षपात पूर्ण चलन कर उन्हें सम्मानित पदों पर बिठाना। भारत की स्थिति आरंभ से ही जातिगत संरचना पर आधारित रही है।जातिगत ढाँचे एवं वर्गभेद के कारण शिक्षा एवं सभी संसाधनों का एकसमान बंटवारा नहीं हो सका। अतः सुविधावंचित वर्गों के कल्याण की चिंता स्वाभाविक हो उठी। यह एक आधुनिक परिघटना ही नहीं है, बल्कि प्राचीनकाल में बौद्ध धर्म, जैन, सिक्ख आदि ने भक्ति आंदोलन के रूप में जाति व्यवस्था को नकारा था। 20वीं शताब्दी में इस प्रकार भी पहल करने वालों में विद्यासागर, गांधी जी, राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फूले, अम्बेडकर आदि नेता एवं समाज सुधारक थे।

औपनिवेशिक शासन में जीवन निर्वाह की दशा को बेहतर बनाने हेतु इनके प्रयासों को अंग्रेजी सत्ता ने भी महत्त्व दिया और सभी को समानता के सिद्धांत के तहत रखा गया। 1850 में बना कास्ट डिस्एबिलिटि एक्ट इसके लिए पहला अधिनियम था। 1885 में प्रांतीय सरकारों ने सुविधावंचितों के बच्चों को शिक्षा प्रदान की। गैर-ब्राह्मण आंदोलन के पश्चात मद्रास सरकार ने गैर-ब्राह्मण के लिए पद आरक्षित किए। मैसूर के महाराजा द्वारा 1918 में गैर-ब्राह्मण वर्गों के उत्थान के लिए समिति का गठन किया गया। इसी प्रकार अखिल भारतीय स्तर पर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिफोर्स 1919 में आया, जिसमें सुविधावंचितों के अभ्यावेदनों पर विचार किया गया। इस प्रकार अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण पहली बार 1943 ई. में किया गया जिसमें 8.33 प्रतिशत सीटें आरक्षित थीं। जून 1946 में इसे 12.5 प्रतिशत कर दिया गया।

भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय एवं समानता के प्रति वचनबद्धता को देखते हुए यह स्थापित किया गया कि शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का बुनियादी साधन है, अतः शिक्षा में भी आरक्षण का प्रावधान लाया गया। 1953 तथा 1978 में पिछड़े वर्गों पर भारत सरकार द्वारा आयोग गठित किया गया, जिसमें कालेलकर आयोग की सिफारिशों को मतभेद के कारण खारिज कर दिया गया जबकि मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1990 में लागू कर दिया गया जो कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को लेकर थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को शिक्षा में अधिक सीटों के आरक्षण की बात की गई तथा उन्हें सभी व्यावसायिक पाठ्यक्रमों एवं उच्च शिक्षा में भी आरक्षण दिया गया।

अतः भेदभाव की सकारात्मक अथवा पक्षपात अथवा आरक्षण की नीति उच्च शिक्षण संस्थाओं में भी है जो कि समानता लाने के लिए आवश्यक कदम है। भारत में सकारात्मक भेदभाव एवं सकारात्मक कार्रवाई की नीति का सूत्रपात-भारत में सामाजिक असमानता एवं भेदभावपूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन के लिए वर्षों से प्रयास किया जाता रहा है, किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस कार्य में भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य ने नीतिगत रूप से कार्रवाई करने का प्रयास किया। हिन्दू जाति के अंतर्गत केवल जातिगत संकीर्णता ही नहीं थी, बल्कि धार्मिक एवं सांप्रदायिक विभिन्नता भी विद्यमान थी। धर्म को आधार मानकर कर्म का निर्धारण एवं समाज का संचालन किया जाता था, जिसमें निम्न जातियों का शोषण होता था।

मध्ययुग में भक्ति आंदोलन के रूप में एक युगांतकारी आंदोलन का आविर्भाव हुआ, जिसमें भेदभाव एवं छुआछूत पर कठोर प्रहार किया गया तथा एक ईश्वर की संकल्पना के साथ रक्त के आधार पर शुद्धता-अशुद्धता को नकारा गया। 19वीं शताब्दी के अंत एवं 20वीं शताब्दी के आरंभ में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महात्मा गांधी, ज्योतिबा फूले, डॉ. अम्बेडकर आदि प्रबुद्ध समाज सुधारकों ने नीतिगत रूप से इनके उद्धार का प्रयास किया। इनके प्रयासों से ही औपनिवेशिक भारत में नागरिकों की समानता का सिद्धांत पेश किया गया।

इस प्रक्रिया में ‘कास्ट डिस्एबिलिटि एक्ट’ (1850) भारत में पहला अधिनियम था। तत्पश्चात 1885 में सुविधावंचितों के बच्चों के लिए शिक्षा का प्रावधान किया गया। साथ ही गैर-ब्राह्मणों के आंदोलनों ने मद्रास सरकार को प्रभावित किया और सरकारी सेवाओं में गैर-ब्राह्मणों के लिए पद आरक्षित किए गए। सर लेस्ले मिल्लर की अध्यक्षता में मैसूर के महाराजा द्वारा इस गैर-ब्राह्मण उत्थान के लिए 1918 में एक समिति का गठन किया गया, जो एक क्रांतिकारी कदम था। 1919, 1935 में विभिन्न प्रांतों की विधानसभा में दलित जातियों को आरक्षण प्रदान किया गया। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कदम अनुसूचित जातियों को पहली बार 8.33 प्रतिशत आरक्षण देकर उठाया गया। यह कार्य 1943 में सरकारी सेवाओं के संदर्भ में किया गया। 1946 में इसे बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया गया।

स्वतंत्रता के पश्चात एवं भारतीय संविधान के कार्यान्वयन के बाद सामाजिक न्याय एवं समानता के प्रति वचनबद्धता को संवैधानिक आधार मिला। अनुच्छेद 46 का कहना है कि “राज्य कमजोर वर्गों एवं विशेष रूप से अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को विशेष सुरक्षा प्रदान करेगा और सामाजिक अन्याय एवं हर किस्म के सामाजिक शोषण से उनका बचाव करेगा।” शिक्षा समाज को दिशा-निर्देश देने का कार्य करती है। राधाकृष्णन आयोग (1948-49) का मानना है कि “शिक्षा समाज के उद्धार का प्रमुख साधन है, जिससे लोकतांत्रिक समाज की स्थापना होती है और जिससे इसके सदस्यों में समानता की भावना कायम एवं सुरक्षित रहती है।” शिक्षा आयोग 1964-66 का मानना है कि शिक्षा का प्रधान उद्देश्य समान अवसर प्रदान करना तथा अल्पसुविधा प्राप्त वर्गों एवं जातियों की दशा को बेहतर बनाना है। 

1953 एवं 1978 में दो आयोगों का गठन किया गया, जिसमें कालेलकर एवं बी.पी. मंडल प्रमुख थे। कालेलकर की सिफारिशों को मतभेद के कारण स्वीकार नहीं किया गया, किन्तु मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1990 में लागू कर दिया गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के द्वारा भारत सरकार के विशेष कर्त्तव्यों के जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि शैक्षिक संस्थाओं में इसमें परिवर्द्धन किया गया तथा अनुसूचित जातियों के लिए 15% तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए 5% आरक्षण किया गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी) ने भी विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को रियायत दी जाए। 1982 में अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के प्रतिशत को 5 से 7.5 कर दिया गया। 

बाद में अनुसूचित जातियों के लिए 15% एवं जनजातियों के लिए 7.5% सीटों को आरक्षित किया गया। भारत सरकार ने इन समूहों के उत्थान के लिए आरक्षण के अलावा भी कई कदम उठाए हैं। छात्रवशत्ति योजना, सुधारात्मक प्रशिक्षण, शैक्षिक त्रुटियों को दूर करने की विशेष व्यवस्था आदि। एक अन्य मुद्दा भी विचारणीय है जिसमें ओ.बी.सी. को आरक्षण देना है। इसके संदर्भ में सभी राज्यों ने अपना अलग-अलग आरक्षण प्रतिशत रखा है।

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