सूरत मध्यकाल में सूरत एक महत्त्वपूर्ण नगरीय केन्द्र था। मुगलों के समय इसके महत्त्वपूर्ण होने के अनेक कारण थे। सूरत की उत्पत्ति और विकास सूरत के विषय में सर्वप्रथम जानकारी 10वीं शताब्दी में चालुक्य साम्राज्य में मिलती है। यह ताप्ती नदी के किनारे स्थित उर्वर क्षेत्र था, जहां कृषि और वाणिज्यिक दोनों प्रकार की फसलें पैदा होती थीं। 10-12वीं शताब्दी में सूरत व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो गया। उत्तरवर्ती सोलंकी के शासन काल में गुजरात साम्राज्य में दक्कन के संसाधनों को आकर्षित करने के लिए इसका विकास कैम्बे के सहायक के रूप में हुआ था। यद्यपि कैम्बे गुजरात का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पत्तन था तथापि सूरत ने गुजरात के अनुपूरक आर्थिक द्वार के रूप में अपनी स्थिति कायम रखी।
1538 में दीव पर पुर्तगालियों का नियंत्रण हो गया। इसके कारण गुजरात में पूर्तगालियों के पत्तन के रूप में सूरत का उत्थान हुआ। मुगलों के अधीन सूरत मुगलों के अधीन सूरत में समृद्धि आई। 1573 ई. में सूरत पर मुगलों की विजय के पश्चात् यह उत्तरी भारत तथा उत्तरी दक्कन के विशाल आंतरिक भूभाग के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण निर्गम द्वार था। सूरत हज तीर्थ यात्रियों के लिए महत्त्वपूर्ण पत्तन बन गया। सूरत ने बंगाल और गुजरात के पत्तनों को जोड़ दिया, जिससे व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा मिला। मुगलों द्वारा 1601 में खानदेश की विजय के पश्चात इसका महत्त्व अधिक बढ़ गया। मुगलों के अधीन सूरत का प्रशासन यहाँ का प्रशासनिक क्षेत्राधिकार एक मुत्सद्दी (सूबेदार) और किलेदार को सौंपा गया था। मुत्सद्दी राजस्व ने संग्रह और प्रशासन के लिए जिम्मेदार था, जबकि किलेदार सैनिक कार्यकलापों को देखता था। वह नगर रक्षा के लिए उत्तरदायी था। हाकिम या स्थान, सूबेदार पत्तन नगर और अभिजात्यों पर नियंत्रण रखता था। सूरत पत्तन राजस्व में चार प्रतिशत का योगदान देता था।
व्यापार और वाणिज्य मुगलों के काल में सूरत ने आयात और निर्यात के बंदरगाह के रूप में कार्य किया। लाल सागर का मार्ग गुजराती व्यापारियों विशेषकर, सूरत के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण था। भारत, ईरान और तूरान के बीच सूरत से बड़ी मात्रा में व्यापार होता था। नगरीय समाज की संरचना सुरत के निवासी गुजरात के सबसे उद्यमी समदाय व बनिया थे। पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों डच और अंग्रेजों ने बहधा बनियों से कडी प्रतिस्पर्धा के बीच प्रमुख दलाल के रूप में पारसियों को सेवा में रखा। सूरत के बोहरा सौदागरों में सर्वाधिक प्रसिद्ध अब्दुल गफूर बोहराओं के संगठन का प्रमुख था। यूरोपीय और सूरत यूरोपियनों ने सूरत को एक व्यापारिक केन्द्र और नगर के रूप में बदल दिया। अंग्रेजों ने मालों और नकदी में लगभग 10 मिलियन पौंड का निवेश किया अंग्रेजी नौसैनिक बल भी सूरत के लिए आय का स्रोत था 1884 में डचों ने सूरत और बटाविया को छोड़कर अपनी सभी फैक्टरियों को बंद करने का निर्णय लिया। डचों का मुगलों और व्यापारियों से अच्छा तालमेल था।
सूरत का नगरीकरण
सूरत की किलेबंदी सर्वप्रथम कच्ची दीवारों से की गई, परंतु मराठों के हमले के पश्चात् औरंगजेब ने मोटी ऊँची दीवार का निर्माण कराया, जिसमें लगभग 15 वर्ष लगे। फिर भी यह कमजोर प्राचीर था। 1717 में मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने नगर के चारों ओर एक विशाल दीवार बनाने का आदेश दिया, जिसे आलमपनाह या बाहरी दीवार कहा गया और पहले की दीवार को आंतरिक दीवार कहा गया। सूरत के अंदर नगर के मूल भाग में सीमा-शुल्क-गृह, टकसाल और दरबार थे। इसके चारों ओर बसावटों का विकास हुआ। प्रत्येक मुस्लिम अमीर एक छोटा आवासीय सेक्टर था, जिसे पुर कहा जाता था।
पुर के केन्द्र में अमीर का आवास होता था। दीवारों के बीच में सुंदर बगीचे लगाए गए थे, जिसकी हिन्दू- मुसलमान दोनों देखभाल करते थे। जाति और व्यवसाय के अनुसार आवास बने थे। सूरत के लोक निर्माण का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण गोपी तालाब था, जिसका विवरण विदेशियों ने दिया है। पानी की अच्छी व्यवस्था थी और स्नान के लिए हमाम बनाए गए थे। मुगल इमारतें प्रायः पत्थरों से बनी धनवान सौदागरों के घर ईंट के बने थे। आम लोगों के घर बांस से बने थे। 18वीं सदी तक नगर की जनसंख्या तेजी से बढ़ी।
18वीं सदी के सूरत का पतन :
सूरत के पतन के कारण सूरत के पतन का महत्त्वपूर्ण कारण एशिया की तीन शक्तियों-सफाविदो, आटोमन और मुगलों का एक साथ कमजोर और । नष्ट होना था। यमन का गृहयुद्ध इस क्षेत्र में व्यापार और वाणिज्य में एक और बाधा था। फारस की खाड़ी में व्यापार और लाल सागर में अर्थव्यवस्था के पतन का सूरत की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा। 1707 में मुगल साम्राज्य का पतन शुरू होने के साथ उत्तर मुगलों के काल में साम्राज्य अस्थिर हो गया। सूरत के आंतरिक भूभागों में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गई। सूरत और इसके आंतरिक भूभागों का आगरा, लाहौर और बनारस के दूरवर्ती क्षेत्रों से संबंध समाप्त हो गया। इसने सूरत के राजस्व को बुरी तरह प्रभावित किया। सूरत के पतन का एक अन्य मुख्य कारण मराठों का युद्ध था। शिवाजी ने 1644 में सूरत पर हमला किया, जिसे यह संभाल नहीं सका। मराठा नायक ने नगर को तबाह कर छोड़ दिया। शिवाजी के बाद 1670 में मराठों ने लूटपाट कर आधे कस्बे को जला दिया।
मराठों के आक्रमण से 1730 ई. में मुस्लिम प्रशासन वित्तीय संकट में आ गया। सूरत की अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान में बम्बई का विकास भी बाधक हुआ। 1673 तक अधिकांश यूरोपीय जहाज सूरत में लंगर डालते, परंतु 1887 में बम्बई मुख्यालय हो गया। इसके साथ सूरत के पत्तन में तेजी से गाद भर रही थी। नबाबों के नगर का उत्थान 18वीं शताब्दी नदी तक सूरत प्रभावशाली नगर था। नवाब बेग खान (1733-46) के शासन के दौरान राजनीतिक कठिनाइयां उत्पन्न हो गयीं, जिसमें मध्यपूर्व में बाजारों के साथ परम्परागत नेटवर्क भी प्रभावित हुए। उसके बावजूद व्यापार के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में नगर अस्तित्व में बना रहा। बेग खान की मृत्यु के पश्चात उसके भाइयों में खींचतान चलती रही। फलस्वरूप सैन्य टुकड़ी का प्रधान मेह अत्युचन्द ने नवम्बर 1747 में किले को अपने नियंत्रण में ले लिया और 12 वर्ष तक शासन करता रहा। मेह अत्युचन्द ने जिस गृहयुद्ध को शुरू किया, उसमें यूरोपीय शक्तियां यहां तक की मराठे भी शामिल हो गए। इसमें मराठों को कुछ सफलता हाथ लगी।
सूरत के गृहयुद्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सामाजिक समूह सौदागरों ने योगदान दिया। अंग्रेजी ईस्ट इण्डिया के बढ़ते हुए नियंत्रण ने जहाजों के बड़े हिस्सेदार मुस्लिम सौदागरों की प्रतिस्पर्धा को बढ़ा दिया। मुस्लिम जहाजरानी समुदाय सूरत का आधिपत्य अंग्रेजों के हाथ में जाने के विरुद्ध था, तथापि नगर के बनियों ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ देना स्वीकार किया। 1714 में एक छोटा-सा बहाना लेकर अंग्रेजों ने सूरत की घेरेबंदी की, जो सूरत ते सौदागरों के लिए सदमा था। अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ने से भारतीय सौदागरों के बीच व्यापार में और कमी आ गई, जिसका प्रभाव बोहरा व्यापारियों पर पड़ा। जहाज के मालिक बोहरा अंग्रेजी जहाजरानी से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सूरत 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सूरत में दो घटनाएं, जिसने सूरत को बहुत अधिक प्रभावित किया 1759 की किलाना क्रांति और 1795 के सूरत के दंगे।
किला क्रान्ति सूरत में 1758 ई. के नवाब सफदरखान की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार विवाद के कारण राजनीतिक संकट गहरा गया। सर्राफों ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया को किले पर कब्जा जमाने तथा सूरत का किलादार बनने का अनुरोध किया और सहयोग करने का भी वादा किया। सत्ताधारी प्रशासन का सूरत पर से नियंत्रण समाप्त हो गया। फलस्वरूप बम्बई की कौंसिल ने नगर का प्रशासन अपने हाथ में लेने का निर्णय किया। ३ मार्च को अंग्रेजों ने नवाब के साथ समझौता किया। 4 मार्च को किले के द्वार खुले और किले पर अंग्रेजी कब्जा हो गया। राजनीतिक प्रभाव वाले व्यापारी अंग्रेजों के प्रति समर्थन को लेकर आपस में विभाजित थे। मराठों ने भी इसमें अड़चन नहीं डाली। सौदागरों की आपसी फूट की वजह से अंग्रेजों का किले पर कब्जा हो गया।
सामाजिक व्यवस्था का चरमराना और 1795 का दंगा मुस्लिम वर्ग के हिंसक विरोध ने 1795 के सूरत दो को जन्म दिया। सूरत का प्रशासन अंग्रेजों से बनियों के हाथ में आ गया था। फलस्वरूप मुस्लिम वर्ग अलग-थलग पड़ गया। 1777 में नायब पद समाप्त कर दिया गया, जिससे अव्यवस्था अधिक बढ़ गई। विदेशियों को आजादी मिल गई और वे हथियार लेकर चलने लगे। बंगाली फकीरों ने सांप्रदायिक भावनाओं को उकसाया। 1788 में दो पारसियों और एक मुस्लिम के बीच के झगड़े ने विकराल रूप धारण कर लिया। अगस्त 1795 में होने वाले दंगे का मुख्य कारण केलापीठ चाकलों में धनी बैंकर अदित राम भट के घर में एक मुस्लिम सेंधमारी करते हुए पकड़ा गया, परंतु मुस्लिमों ने उसका पक्ष लेकर झगड़े को और अधिक बढ़ा दिया। प्रतिशोध लेने के लिए मुस्लिमों की भीड़ एकत्र हो गयी, जिसका नेतृत्व सैय्यद शफुद्दीन कर रहा था।
मुस्लिमों के असंतोष और पृथक्कता से धार्मिक उग्रवाद को बढ़ावा मिला, जिससे सूरत का कॉस्मोपोलिटन समाज बिखर गया। दंगों के विरोध में दुकानें बंद कर दी गई। इसके परिणामस्वरूप पूंजी तथा व्यापार बम्बई की ओर जाने लगा। व्यापार नेटवर्क का जारी रहना यद्यपि सूरत 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पतन की ओर था, परंतु उसका व्यापार नेटवर्क जारी रहा। जैसे व्यापार का एक नेटवर्क सूरत से लिस्बन अब भी चल रहा था। सूरत से अब भी बहुत-सी वस्तुओं; जैसे कपास, कॉफी, लौंग आदि का निर्यात हो रहा था।
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