1971 में जब बंगलादेश स्वतंत्र हुआ, तब मुजीबुर्रहमान ने सभी दक्षिण एशियायी देशों को संगठित करने का प्रयास प्रारंभ किया, परंतु 1975 में उनकी हत्या कर दी गई। उनकी हत्या के बाद भी यह चिंतन विचारणीय रहा। श्रीमती गाँधी ने इस विचार को साकार करने का प्रयत्न किया। फलतः 1983 में दिल्ली में दक्षिण एशियायी देशों के विदेश मंत्रियों की एक बैठक हुई और सार्क संगठन के प्रारूप को निर्मित किया गया।
1985 में ढाका में सार्क का प्रथम सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में इस संगठन का नाम दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) रखा गया और इसके लक्ष्य एवं उद्देश्य निर्धारित किए गए। इसके संविधान के अंतर्गत निर्धारित लक्ष्यों की निम्नलिखित विशेषता है:
(i) सार्क ने दक्षिण एशियाई देशों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयत्न किया है। इस संगठन के माध्यम से दक्षिण एशियाई देश संगठित होकर अपनी समस्याओं का निदान आसानी से कर सकेंगे।
(ii) सार्क शांतिपूर्ण प्रक्रिया के द्वारा दक्षिण एशियाई देशों का विकास करना चाहता है।
(iii) सार्क दक्षिण एशियाई देशों के बीच मुक्त व्यापार की अनुमति प्रदान करता है, ताकि गरीब राष्ट्रों को भी आवश्यकता की वस्तुओं को प्राप्त करने का अवसर मिल सके।
(iv) सार्क उदारतापूर्ण आर्थिक नीति का अवलंबन कर गरीब राष्ट्रों को आर्थिक क्षेत्र में छूट प्रदान करता है।
(v) सार्क शिक्षा, तकनीकी, विज्ञान आदि के क्षेत्र में दक्षिण एशियाई देशों को सहयोगात्मक नीति के आधार पर विकास का अवसर प्रदान करता है।
(vi) सार्क की महत्त्वपूर्ण विशेषता है दक्षिण एशिया में शांतिपूर्ण वातावरण का निर्माण करना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, लोकतंत्र की मजबूती और आर्थिक विकास का रास्ता साफ करना है।
(vii) सार्क की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता अथवा अखण्डता में हस्तक्षेप नहीं करता है।
(viii) सार्क समानता के सिद्धांत को मान्यता देता है।
(ix) यह सहअस्तित्व की भावना को उजागर करता है।
सार्क का भविष्य-दक्षिण एशिया में सार्क का भविष्य उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। 1985 से सार्क के सातों सदस्य देश उत्साहपूर्वक इसमें अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इसका पहला सम्मेलन ढाका में हुआ और भूटान, मालदीव श्रीलंका, भारत और पाकिस्तान आदि देशों में अनेकों बार शिखर सम्मेलन आयोजित किए गए। इन सम्मेलनों में विभिन्न समस्याओं के निदान जैसे-शिक्षा का विकास, तकनीकी सहयोग, व्यापार का विकास आदि विषयों पर विस्तृत रूप से विचार-विमर्श हुआ और सभी देशों को इस संगठन के द्वारा सहयोग मिलना भी प्रारंभ हुआ।
यह संगठन दक्षिण एशिया में आर्थिक विकास के लिए मुक्त द्वार को नीति अपना रहा है। सार्क के माध्यम से जिससे सभी देशों के बीच वाणिज्य-व्यवसाय की समस्या सहयोगात्मक रूप से सुलझाई जा रही है। दस शिखर सम्मेलनों से यह स्पष्ट हुआ है कि भविष्य में सार्क एक सफल संगठन सिद्ध होगा। यदि सभी राष्ट्र हृदय की पवित्रता से इस संगठन को बनाये रखने का प्रयत्न करेंगे तथा सहयोगात्मक नीति का अवलंबन करते रहेंगे, तो भविष्य में निश्चित रूप से यह संगठन दक्षिण एशियायी देशों के लिए लाभप्रद और उपयोगी रहेगा।
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