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भारत में क्षेत्रवाद के फैलाव के कारकों की चर्चा कीजिए।

 हम जानते हैं कि भाषा, नृजातीय, संस्कृति तथा धर्म ही थे जो स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में प्रांतीय पहचान निर्माण का आधार बन गए। प्रांतवाद के प्रारंभिक रूपों से पचास के दशक में संयुक्त महाराष्ट्र, विशाल आन्ध्र अथवा महा गुजरात हेतु माँगों में अभिव्यक्ति मिली। जैसा कि ऊपर चर्चा की गई, राज्यों के पुनर्गठन से तात्पर्य, देखें 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम, इसी प्रकार की माँगों को स्वीकार कर लेने से ही था। 

एक वर्ग संदर्श में साठ व सत्तर के दशकों में भारतीय राजतंत्र के प्रांतीयकरण को हरित क्रांति के चलते प्रांतीय दलों के साथ साठ-गाँठ में धनी भूमि-संपन्न कृषिवर्ग के उदय का श्रेय दिया जा सकता है। संख्यात्मक रूप से सशक्त मध्य जातीय प्रबल कृषिवर्ग के नेतृत्व वाले अधिकांश ग्रामीण परिधीय सामाजिक समूहों की बढ़ती भागादारी के लिहाज से चुनावी लोकतंत्र के विस्तार ने इस वर्ग के सत्ता आधार को और अधिक संपीड़ित कर दिया। कृषिक मध्यवर्ग के साथ-साथ शहरी निम्न मध्यवर्ग भी जाहिर तौर पर वित्तीय व प्रशासनिक मामलों में सत्ताओं के संघीय हस्तांतरण से लाभान्वित होना था।

केंद्र-राज्य संघर्षों को अनुमत्य बनाए जाने के अलावा, इस नए वर्ग बल ने अन्तरप्रांतीय तनावों में वृद्धि की ओर प्रवृत्त किया, क्योंकि परिधीय उप-प्रांत आर्थिक रूप के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी उपेक्षित महसूस करते थे। यह अशतः कच्छ, सौराष्ट्र, मराठवाडा, विदर्भ, तेलंगाना तथा झारखंड के मामले की भाँति आर्थिक भेदभाव की धारणा अथवा तीव्रतर आर्थिक विकास हेतु आग्रह के आधार पर वर्धमान प्रांतीय पहचान के निर्माण को स्पष्ट करता है। अपनी भाषायी, सांस्कृतिक तथा जनजातीय सर्वमान्यता पर पहुँचते विभिन्न उप-राष्ट्रीय पहचान समूहों की लामबंदी अल्पविकासाभाव-विरुद्ध शिकायत से सहसंबद्ध थी।

इसके अतिरिक्त, भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम वर्षों में राष्ट्रवादी विकासात्मक कार्यसूची जिसका झुकाव राज्य नियंत्रणवादी था, का महत्त्व भी स्पष्ट करता है कि क्यों इन प्रांतीय समूहों ने विशेष विकास उपसायों हेतु आवश्यकता समेत माँगों की अभिव्यक्ति के अपने मौलिक नृजातिवादी आधार को परिष्कृत किया, यथा झारखंड।  इस प्रकार कच्छ, सौराष्ट्र मराठवाड़ा तथा विदर्भ के लिए विकास बोडे गठित करने पड़े ताकि इन प्रांतों की शिकायतों को सुना जा सके जिन्होंने पचास व साठ के दशकों से ही अपने प्रांतों को राजनीतिक रूप से अधिक प्रबल प्रांतों को लाभ पहुँचाने हेतु अपने ही राज्यों में आंतरिक उपनिवेशों की भाँति व्यवहार किए जाते हुए देखा था।

तथापि, प्रबल भाषायी अभिजात्य वर्ग जो तब लघुतर, कम विकसित उप-प्रांतों को बृहत्तर भाषायी प्रांतों में सहयोजित करने में सक्षम था, उप-प्रांतों के कुसंतुलित आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप भाषायी अथवा सांस्कृतिक संसक्ति के नाम पर ऐसा करने में बहुत जल्द सक्षम नहीं था। सारभाग-केंद्रों का निर्माण करते प्रबल उप-प्रांतों कसाथ उपांतिकों जैसा व्यवहार किए जाने के अहासास पर उस तथ्य से बल दिया गया कि इनमें से अधिकांश उप-प्रांत खनिजों व प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से संपन्न थे, यथा झारखंड।

इसके अतिरिक्त इस तथ्य ने कि इन बड़े राज्यों में से कुछ, जैसे बिहार, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश आर्थिक क्षेत्र में अकर्मण्यता के लिए जाने जाते थे, इन राज्यों के विशिष्ट उप-प्रांतों को केरल, पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा हरियाणा कि भाँति तीव्रतर आर्थिक में सक्षम हुए छोटे राज्यों के विचार से सोचने की ओर प्रवृत्त किया। हाल ही में गोरखालैंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ हेतु अलग राज्य के लिए क्षेत्रीय आंदोलनों का जिक्र इस प्रसंग में किया जा सकता है। तब हम हिंदी हृदय-प्रदेश, यथा उत्तर प्रदेश में बुंदेलखण्ड, पूर्वांचल एवं हरित प्रदेश तथा बिहार में मिथिलांचल, जैसे राज्यों में विभिन्न उपभाषायी संप्रदायों के अभिकथन का भी संदर्भ ले सकते हैं।

तत्पश्चात् उनके अनूठे संकतार्थों वाले इन प्रांतों में राजनीतिक पहचान के उपर्युक्त रूप की यथार्थ प्रक्रिया को उन सार्वजनिक नीतियों के कार्यान्वयन से सहसंबद्ध किया जा सकता है जो तथाकथित रूप से प्रांतीय संतुलन पैदा करने पर अभिलक्षित थीं।  नई-नई व्यक्त हुई राजनीतिक पहचानों से उठी राजनीतिक माँगों का समुचित उत्तर देने में, नेहरूवियन भरत में अंगीकृत, प्रशासन के बुद्धिवादी-पूर्णवादी नैकरशाही मॉडल की विफलता सांस्कृतिक कारकों पर आधार-वाक्य के रूप में कही गई तथा असमान एवं अक्षम विकास के अपराध-कर्म ने नृजातीय स्वायत्ततावादी आंदोलनों की विकास-अभाव-परिभाषा को तर्कसंगति प्रदान की, जैसे झारखंड में।

निष्कर्षतः ऐतिहासिक रूप से उपांतिक प्रांतीय समूहों को स्वयं को आत्म-सचेत नृजातीय पहचानों के रूप में अभिव्यक्त करने हेतु संघटित किया गया है ताकि वे अपने राजनीतिक संसाधन बढ़ा सकें और अपने निजी हित में नीति प्रक्रिया को प्रभावित कर सकें। सभी हाल में, इनमें से गोरखालैंड, बोडोलैंड, लद्दाख जैसे कुछ उप-प्रांतों को जिला परिषद् अथवा स्वायत्त प्रांत का दर्जा दिए जाने से स्थानीय लोगों की विकासात्मक आकांक्षाएं मुश्किल से पूरी हुई है।

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