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पंत के काव्य में अंतर्निहित प्रगतिवादी जीवनबोध पर प्रकाश डालिए।

 पंत का प्रगतिवादी जीवन ‘युगान्त’ से प्रारम्भ होता है और ‘युगवाणी’ से होता हुआ ‘ग्राम्या’ में जाकर समाप्त हो जाता है।

साधारणतः ‘प्रगति का अर्थ बढ़ना है, किन्तु हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद’ एक रूढ़ि शब्द बन गया है, जिसका अर्थ है मार्क्स-दर्शन का साहित्यिक रूप दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि दर्शन में जो द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद है, राजनीति में जो साम्यवाद है, वही साहित्य में प्रगतिवाद है।

पंतजी प्रगतिवाद को छायावाद की ही एक धारा मानते हैं। ‘रश्मिबन्ध’ के ‘परिदर्शन’ में वे लिखते हैं ” प्रगतिशील कविता वास्तव छायावाद की ही एक धरा है।

दोनों के स्वरों में जागरण का उदात्त सन्देश मिलता है एक में मानवीय जागरण का, दूसरे में लोक-जागरण का दोनों की जीवन-दृष्टि में व्यापकता रही है एक में सत्य के अन्वेषण या जिज्ञासा की, दूसरे में यथार्थ के बोध की।”

‘रूपाभ’ पत्रिका के पहले अंक (1938) में उन्होंने लिखा है, “कविता के स्वप्न-भवन को छोड़कर हम इस खुरदुरे पथ पर क्यों उतर आए, इस संबंध में दो शब्द लिखना आवश्यक हो जाता है।

इस युग में जीवन की वास्तविकता ने जैसा उग्र आकार धारण कर लिया है, उससे प्राचीन विश्वासों में प्रतिष्ठित हमारे भाव और कल्पना के मूल हिल गए हैं…… अतएव इस युग की कविता स्वप्नों में नहीं पल सकती।

उसकी जड़ों को अपनी पोषण-सामग्री ग्रहण करने के लिए कठोर धरती का आश्रय लेना पड़ रहा है।… यदि हमें सत्य के प्रति वास्तविक उत्साह है, तो हम अपने महान् उत्तरदायित्व की अवहेलना नहीं कर सकते…. हमारा निश्चित ध्येय प्रगति की शक्तियों को सक्रिय योग देना होगा।” इस कथन से स्पष्ट है कि पंत एक कवि के रूप में अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वाह की भावना से प्रेरित होकर प्रगतिवादी साहित्यांदोलन से जुड़े।

प्रगतिवाद एकदम यथार्थवादी है। जो यथार्थ है, वही उसके लिए सत्य है, अन्यथा सब असत्य और निस्सार है। प्रगतिवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. धर्म, ईश्वर एवं परलोक में अविश्वास
  2. पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा
  3. शोषित वर्ग के प्रति उदारता और उसका चित्रण
  4. नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण
  5. परिवर्तनशीलता के प्रति मोह
  6. भाषा की सरलता।

अब देखें पंत-काव्य में यह प्रवृत्तियाँ कहां तक उपलब्ध होती हैं।

1 धर्म, ईश्वर एवं परलोक में अविश्वास आध्यात्मिकता केवल कल्पनाजन्य है, उसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रगतिवादी कवि न तो धर्म में आस्था रखता है, न ईश्वर में और न परलोक में उसके समक्ष मानव और मानव-समाज के अतिरिक्त कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं है।

पंतजी की ये पंक्तियाँ देखिए, “मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें मानव ईश्वर! और कौन-सा स्वर्ग चाहिए तुम्हें धरा पर!"

2 पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा साम्यवादियों का यह मत है कि इस धरा पर दु:ख और क्लेशों के मूल कारण सामाजिक एवं आर्थिक विषमताएँ हैं और इन विषमताओं के जनक हैं पूँजीपति।

यदि समाज में पूँजीपति न हों, तो न ये विषमताएँ रहेंगी और न तज्जन्य दुःख-क्लेश आदि। पूँजीपति समाज के लिए भीषण अभिशाप हैं। 

प्रत्येक प्रगतिवादी कवि ने इनके प्रति घृणा का रुख अपनाया है, वे नृशंस हैं वे जन के श्रमबल से पोषित दुहरे धनी, जोंक जग के, भू जिनसे शोषित।

3 शोषित वर्ग के प्रति उदारता और उसका चित्रण पूँजीपतियों के प्रति प्रगतिवादियों की प्रतिक्रिया है शोषित वर्ग के प्रति उदार की अभिव्यक्ति। उन्होंने जितनी पूँजीपतियों को निन्दा की है, उतना ही शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन भी किया है।

उनकी दयन. स्थिति का चित्रण करने में ही इन कवियों ने अपनी कविता की सार्थकता मानी है। दिनभर के भारी श्रम से थके हुए श्रमिक जब सन्ध्या -समय अपने घर को लौटते हैं, तो कवि पंत का हृदय उन्हें देखकर करुणा से भर जाता है और वे कह उठते हैं, "ये नाप रहे निज घर का मग कुछ श्रमजीवी घर डगमग डग, भारी है जीवन! भारी पग!"

किसान की दशा पर दु:ख प्रकट करते हुए लिखते हैं,

युग-युग का यह भारवाह, आकटि नत मस्तक
वज्र मूढ़ जड़ मूल हठी, वृष-बांधव कर्षक।

पंत ने अपनी ‘ग्राम्या’ में रूढ़ियों, अंधविश्वासों, वर्णव्यवस्था, जातीय ऊँच-नीच की भावना, कर्मफल और भाग्यवाद को कृषक जीवन का अभिशाप बताते हुए किसानों के सहज और छल-कपट-रहित जीवन के प्रति गहरी सहानुभूति जगाने का उल्लेखनीय प्रयास किया है।

4 नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में प्रगतिवाद साम्यवाद से प्रभावित है और प्रेम-विषयक दृष्टिकोण में फ्रायडवाद से इसलिए वह प्रेम-वासना-तृप्ति को भी जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता मानता है।

पंतजी इसी भाव को निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त करते हैं, “धिक् रे मनुष्य, तुम स्वच्छ, स्वस्थ, निश्छल चुम्बन अंकित कर सकते नहीं प्रिया के अधरों पर? मन में लज्जित, जन से शंकित, चुपके गोपन तुम प्रेम प्रकट करते हो नारी से कायर!"

प्रगतिवादी समाज में नारी का महत्त्वपूर्ण स्थान मानता है। उसका मत है कि नर-नारी के समुचित संबंध में ही समाज का वास्तविक विकास निहित है।

अतः नारी को भी समाज में उसके यथोचित अधिकार मिलने चाहिए। वह ‘काम-पुत्तलिका’ मात्र न होकर ‘मानद रूप में प्रतिष्ठित हो। पंत ने इन भावों को इस प्रकार प्रकट किया है,

उसका जीवन-मान, मान पर नर के हैं अवलम्बित।
योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित,
उसे पूर्ण स्वाधीन करो, वह रहे न नर पर अवसित!

नारी का नारीत्व उसके सहज स्वभाव में है, बनाव-ठनाव में नहीं। जो नारी केवल शृंगार-प्रसाधनों से अपने रूप को संवारना चाहती है, वह समाज का कोई हित नहीं कर सकती।

वह ‘फूल, लहर, तितली, विहगी, मार्जारी’ आदि सभी कुछ हो सकती है, किन्तु वास्तविक अर्थ में नारी नहीं हो सकती। पंतजी ने ‘आधुनिका नामक कविता में इन्हीं भावों को वाणी दी है।

5 परिवर्तनशीलता के प्रति मोह प्रगतिवादी कवि प्राचीन परम्पराओं और रूढ़ियों के कट्टर विरोधी हैं। उनका दृढ विश्वास है कि जग का वास्तविक विकास लकीर का फोर” होने में नहीं, वरन् निरन्तर परिवर्तनशीलता में है

इसलिए पतजी भी पुरातनता का निर्मोक दूर फेंककर नवीनता का आह्वान करते हैं। उनकी द्रुत झरो’ कविता इसी भाव का व्यंजक है। 

"दूत झरो जगत के जीर्ण पत्र हे त्रस्त-ध्वस्त. हे शष्क-शीर्ण हिम-ताप-पीत, मधु वात-भीत, तुम वीतराग, जड़ पुराचीन। गा कोकिल वरसा पावन कण, नष्ट-भ्रष्ट हो जीण पुरातन"

6 भाषा की सरलता प्रगतिवादी कवि जिस प्रकार जीवन के आडम्बरों में विश्वास नहीं करता, उसी प्रकार भाषा का आडम्बर भी उसे स्वीकार्य नहीं है।

उसका मत है कि भाषा केवल विचाराभिव्यक्ति का माध्यम है। अलंकृत करने से भाषा में कृत्रिमता आ जाती और विचाराभिव्यक्ति सफल नहीं हो पाती।

अत: वह भाषा के सारल्य पर अधिक बल देता है ” वाणी मेरी चाहिए तुम्हें क्या अलंकार उसका भाषाविषयक मूल सिद्धांत है।

यही कारण है कि छायावादी पंत में जहाँ भाषा पूर्णतया अलंकृत होकर नव-यौवना की भाँति रुनझुन करके हृदय में स्पन्दन करती चलती है, वहाँ प्रगतिवादी पंत की भाषा निरलंकृत और सरल है।

यथा "हाँका करती दिनभर बन्दर, अब मालिन की लड़की तुलसा।"

अलंकारों की भांति छंदों का बंधन भी प्रगतिवादी स्वीकार नहीं करते। उनका विश्वास है कि छंदों के बन्धनों से मुक्त होकर ही ‘वाणी अयास’ बहती है।

खुल गए छन्द के बन्ध
प्राण के रजत पाश

पंतजी की विशेषता यह है कि उन्होंने साम्यवाद और भौतिकवाद को अपनी भारतीय सांस्कृतिक चेतना और अध्यात्मवादी बोध की परिधि में ही स्वीकार किया।

उसे सम्पूर्ण मानव सत्ता की प्रतिष्ठा या मानव के सम्पूर्ण उत्थान की एकमात्र विचारधारा नहीं माना। अपनी अंतिम परिणति में पंत भौतिकवाद के साथ गांधीवाद और अध्यात्मवाद के समन्वय पर बल देते हैं।

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