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पूछा राजै कहु गुरू सूआ। न जनौं आजु कहाँ दहुँ ऊआ॥ पौन बास सीतल लेइ आवा। कया दहत चंदनु जनु लावा।। कबहुँ न ऐस जुड़ान सरीरू। परा अगिनि महँ मलय समीरू॥

 सन्दर्भ प्रस्तुत पंक्तियाँ जायसी कृत ‘पद्मावती’ के ‘सिंहलद्वीप खंड’ से ली गई हैं। तोते के राजा रत्नसेन से मिलने पर रत्नसेन को एक सुखद अनुभूति होती है और वह तोते से अपनी अनुभूति को प्रकट करता है, उसी का वर्णन यहाँ है।

व्याख्या:- राजा रत्नसेन ने तोते करनी प्रारम्भ की कि न मालूम आज भाग्य से यहाँ तक कहाँ आ गये हैं? यहाँ की वायु भी प्रअत्यन्त शीतल है। यह सुगन्धित वायु शरीर की तपन को चन्दन के समान शीतल करने वाली है।

जो ठंडक एवं शीतलता शरीर को अब मिली है, वह पहले कभी नहीं प्राप्त हुई। इसे प्राप्त कर ऐसा लगता है मानो अग्नि में मलयगिरि को हवा लग रही हो। सूर्य की किरणों से यहाँ एक रेखा-सी निकल रही है।

उसके द्वारा सारे संसार का अन्धकार दूर हो गया है। सर्वत्र संसार पवित्र-सा दिखाई पड़ रहा है। सामेन ही बादल भी उठते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। 

आकाश में बिजली भी चमकती हुई प्रतीत होती है। आकाश में चारों और चन्द्रमा का प्रकाश दिखाई पड़ता है। उसी चन्द्रमा के पास कृतिका नक्षत्र भी है और चारो ओर से आकाश नक्षत्रों से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। ऐसा लगता है। 

जगह-जगह पर दीपक प्रकाशित हो रहे हों। दक्षिण की ओर सोने का सुमेरु पर्वत दिखाई पड़ रहा है। चारों ओर ऐसी सुगन्धित वायु आ रही थी जैसे कि बसन्त ऋतु में आती है।

विशेष-1. जग योगी की साधना पुरी जो जाती है तो उसे चारों ओर का वातावरण हर्षित एवं सुखद दिखाई देता है। इसी को कबीरने अनहद-नाद भी कहा है।

  1. कवि ने यहाँ प्रकृति का भी सुन्दर वर्णन किया।
  2. अलंकार-समासोक्ति।

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