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मेरा पग पग संगीत भरा, श्वासों से स्वप्न-पराग झरा, नभ के नव रँग, बुनती दुकुल छाया में मलय-बयार पली !

मेरा पग पग संगीत भरा,

श्वासरों से स्वप्न-पराग झरा,

                        नभ के नव रेंग, बुनती दुकूल

                         छाया में मलय-बयार पली !

 मैं क्षेितिज-भूकुटि पर घिर धूमिल

चिन्ता का भार बनी अविरल,

                          रज-कण पर जल-कण हो बरसी

                          नवजीवन-अंकुर बन निकली!

 संदर्भ इन पक्तियों में भी अपनी तुलना बदली से करती हुई कवयित्री अपने दुःखी हृदय के उदात्त भावों, बिंब के प्रति अपनी सहृदयता और मंगल-कामना व्यक्त करती है।

व्याख्या: मेघ क्षण-क्षण पर मंद स्वर में गरजता है, उसका गर्जना वर्षा का सूचक है। अत: उसे सुन सब हर्ष-विभोर होते हैं। महादेवी वर्मा या विरहिणी नारी भी अपने मधुर वचनों से सबको हर्षित करती है, अपने कार्यों से मानव के उज्ज्वल भविष्य का घोष करती है।

मेघ की आर्द्रता लेकर पवन शीतल हो उठता है, विरहिणी कवयित्री की कामनाएँ भी विश्व-मंगल से संबद्ध हैं, उनके भविष्य के सपने ” कोमल तथा मधुर हैं। 

वर्षा ऋतु में जब इंद्रधनुषी रंगों का रेशमी दुपट्टा धारण किया हुआ है। विरहिणी के हृदय में भी रंग-बिरंगी काम तरह-तरह के सपने उसके हृदय को इंद्रधनुषी भाव-तरंगों से भर देते हैं।

बदली की छाया में, शीतल मंद पवन के झोंकों का स्पर्श पा ग्रीष्माताप से संतप्त प्राणियों को राहत मिलती है, विरहिणी के कोमल, संवेदनशील हृदय के भाव भी संतप्त प्राणियों को शीतलता प्रदान करते हैं, उनकी पीड़ा को हरते हैं।

वर्षा ऋतु में क्षितिज पर बदली धीरे-धीरे ऊपर उठती है. घिरती है और उसका रंग श्यामल होता है। सघन होने पर पृथ्वी की ओर झुकती है, फिर बरसती है, उसका जल शुष्क धरती पर पड़ता है, उसे शीतल बनाता है और फिर उसके संस्पर्श से साए पड़े बीज अंकुरित हो उठते है, अंकुर के रूप में लहलहा उठते हैं। विरहिणी की भौंहें भी चिंता व्यथा व्याकुलता के भार से निरंतर नीचे की ओर झुकी रहती हैं, उन झुकी भौंहों से उसके हृदय की व्यथा का स्पष्ट संकेत मिलता है। वह अपनी संवेदनशीलता, करुणा, विश्व-मंगल की भावनाओं सं स्वयं दु:खी होते हुए भी संसार के अन्य प्राणियों के हृदय में नई आशा, नया उल्लास भरती है, उनके शुष्क, मृतप्राय प्राणों में नवजीवन का संचार करती है। स्वयं को मिटाकर भी, सर्वस्व त्याग कर भी वह दूसरों को सुखी बनाना चाहती है।

विशेष 1. एक साथ तीन अर्थ भरना कवि-कौशल का परिचायक है। ये तीन पक्ष हैं बदली, विरहिणी, कवयित्री तथा भारतीय नारी

2 रूपक तथा पुनरुक्ति अलंकार।

3 प्रकृति के साथ हृदय की रागात्मक स्थितियों का सामंजस्य।

4 भाव साम्य करुणा की नव अंगड़ाई-सी, मलयानिल की परछाई-सी।।

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