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रूपवादी समीक्षा के महत्व पर विचार कीजिए।

नयी समीक्षा का उद्भव और विकास दो विश्व-युद्धों की ध्वंसात्मक चेतना के बीच हुआ। स्वभावतः इस समीक्षा-पद्धति पर अस्तित्ववादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा। ज्याँ पाल सार्त्र ने अस्तित्ववाद का मूल सूत्र देते हुए कहा है कि पहले अस्तित्व होता है बाद में तत्त्व या सार (एग्ज़िस्टेन्स प्रिसीड्स एसेन्स)। अस्तित्वादी विचारधारा की भाँति ही नयी समीक्षा यह मानती है कि कविता या नाटक एक कलाकृति है - मात्र भाव या विचार। कविता में जितना महत्व 'टेक्स्चर' (शब्द-विधान अथवा रुप-विधान) का है, अर्थ-विधान (स्ट्रक्चर) का उतना नहीं। जान क्रो रैन्सम कविता में शब्द-विधान या रुप-विधान को ' प्रधानता देते हैं। इस प्रकार की दृष्टि पर अस्तित्ववाद की विचारपरक छाया है। अस्तित्ववाद के अनुसार जीवन का अस्तित्व वर्तमान में ही है। इसी सूत्र को पकड़कर नयी समीक्षा सभी पुरानी ऐतिहासिक समीक्षा पद्धतियों का निषेध करती है। अस्तित्ववाद अपनी पूरी ताकत से दर्शन और विज्ञान का विरोध करता है - और ठीक यही स्थिति नयी समीक्षा में मिलती है। दर्शन से पल्‍ला झाड़कर ही नयी समीक्षा आधुनिक भाषाशास्त्र और बिंदवाद का सहारा लेती है। काव्य की अर्थ-मीमांसा के पीछे मूर्त्त-गोचर यंथार्थ अनुभव और कृति में अनुभूति की ईमानदारी और प्रामाणिकता का आग्रह है।

बीसवीं शताब्दी के आधुनिकतावादी चिंतन की व्यक्तिवादिता के मूल में औद्योगीकरण और वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त 'प्रणति' और 'विकास' का मॉडल ही सक्रिय है। आत्म-निर्वासन, श्रम के परायेपन से उत्पन्न पीड़ा, यंत्रणा, कुंठा, अकेलापन के कारणों में पूँजीवाद-सात्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का कसता हुआ पंजा है। आधुनिक विज्ञान, संचार क्रान्ति और उद्योग तीनों ने मिलकर काव्य की सार्थकता पर ही प्रश्न-चिह्नन लगा दिया। आधुनिक प्रगति ने मानव को भीतर से छीलकर एक सांस्कृतिक संकट के सामने खड़ा कर दिया, जिसमें एक मृल्य-विहीन समाज का जन्म हुआ। प्रथम विश्व-बुद्ध ने एक ऐसी भूल्यांचता की स्थिति को जन्म दिया कि विश्व की सांस्कृतिक शक्तियाँ चकराकर निराशा- अनास्था में गर्क होती दिखलाई पड़ने लगीं। जे.वी.क्रच ने 'दि मॉडर्न टेम्पर' शीर्षक पुस्तक में मॉडर्न टैम्पर के मूल में निषेध और नकारवादी मानसिकता की एक ऐसी तस्वीर पेश की है जिसका साम्य टी.एस.एलियट के 'हॉलोमैन' या खोखला आदमी में मिलता है। आत्मघाती मूल्यांघता के इसी अंधकार को लायबन ट्रिलिंग ने 'दि मॉडर्न एलिमेंट इन मॉडर्न लिटरेचर ' में मानसिक विक्षिप्तता, अजनबीपन, बौद्धिक-नैतिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक पतन से जोड़कर 'जीवन के आधुनिक अभिशापौं' का बखिया उधेड़कर सामने रख दिया है। 'अमानवीकरण ' (ड्िि-ह्यूमेनाइज़ेशन) और 'आत्म-निर्वासन ' (सेल्फ- एलीनिएशन) की इस प्रक्रिया के मूल में विश्व पर आघात करते सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की चोट के रिसते घाव हैं। टी.एस,एलियट इन्हीं घावों की पीडाओं से बेचैन होकर 'वेस्टलैण्ड' जैसी लम्बी कविता में मानवीय संवेदना के बंजरपन की कहानी कहते हैं। एलियट से पहले स्वय॑ मैथ्यू आर्नल्ड कल्चर एण्ड एनाकी' में नाशोन्मुख यूरोपीय समाज के दु:स्वप्न देखते हैं। दु.स्वप्न क्यों देखते हैं? उन्हें पता है कि डार्विन, मिल, स्पेंसर के बुग ने धर्म का विनाश कर दिया है। ऐसी स्थिति में धर्म का स्थान कविता ही ले सकती है। नयी समीक्षा के जनक एलियट और नयी समीक्षा के प्रवर्तक जान क्रो रैन्सम का झुकाव यों ही मैथ्यू आर्नल्ड की ओर नहीं है - उसके गहरे ऐतिहासिक-सांस्कृतिक कारण हैं। इन्हीं कारणों को तार्किक ढंग से एफ.आर,लीविस अपनी पुस्तक 'मास सिविलाइजेशन एंड माइनॉरिटी कल्चर ' में प्रस्तुत कर देते हैं कि कैसे यूरोपीय संस्कृति का पतन और यांत्रिक मानव के विवेक का क्षरण हुआ है। इस अंधे युग में यदि थोड़ी से रोशनी की किसी से या कहीं से उम्मीद की जा सकती है तो थोड़े से विवेक वयस्क चिंतकों-बौद्धिकों-रचनाकारों से ही। नए समीक्षकों को इस बात का श्रेय देना पड़ेगा कि अपनी बहुत सी कमज़ोरियों के बावजूद इन सभी ने इस अंधेरे में अपनी बौद्धिक मशाल जलाकर एक महत्वपूर्ण दायित्व के निर्वाह का प्रयत्न किया।

नए समीक्षकों ने अपने दायित्व को समझकर ही रोमानी प्रवृत्तियों के विरोध का बीड़ा उठाया और विक्टोरियन युग के साहित्य की नैतिक मर्यादावादी दृष्टि के ऊपर से पड़ी भ्रम की चादर उठां दी। मार्क्सवादी-यथार्थवादी चिंतकों के प्रचारवाद के झूंठ को समझते हुए इस विचारधारा का विरोध किया और फ्रायड के अवचेतन सिद्धांतों के मनोरोगी मानव की उपेक्षा कर नये समीक्षक आगे बढे। नये समीक्षकों ने परम्परा का पुनर्मुल्‍यांकन किया और साहित्य पर पुनर्विचार के लिए कदम उठाया। रूसो के चिंतन पर प्रश्न-चिहन लगाते हुए बैविट और ह्यूम ने उन्‍नीसवीं शताब्दी के जीर्ण-शीर्ण सोच से मुक्ति पाने की जोरदार पहल की। नये-समीक्षको ने यह प्रयास किया कि सांस्कृतिक परम्परा को नए ढंग से पुनः परिभाषित और जीवित किया जा सकता है। आगे चलकर हम देखेंगे कि नयी समीक्षा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ इसी सत्य से साक्षात्कार कराती हैं। यह बात भी ठीक-ठीक संदर्मों में समझनी जरूरी है कि नयी समीक्षा की महत्व प्रतिष्ठा के मूल में रोमानी काव्य मूल्यों का विरोध भर नहीं है। बीसवीं शताब्दी में ज्ञान-विज्ञान का नए ढंग से विस्फोट और ज्ञान के अनेक अनुशासनों के उदय के इस पूरे परिवेश ने कलाकृति की प्रकृति पर गहरा प्रभाव डाला। नए ज्ञान-विज्ञान की अनेक नयी शाखाओं से नये समीक्षकों को नयी अंतर्दृष्टि मिली। फलत: समीक्षा में विद्वता का नया अर्थ-संदर्भ भी जुड़ गया।

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