स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने अपने संविधान में शासन-प्रशासन और विधि के क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग के लिए भाषा योजना की संकल्पना रखी। भाषा योजना के कुल चार चरण होते हैं - चयन, संहिताकरण, विशदीकरण और अनुपालन। इसकी स्थापना के पीछे का उद्देश्य शासन-प्रशासन तथा विधि आदि क्षेत्रों के लिए मानक भाषा और पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण करना था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान निर्माण के दौरान ही यह उपबंध किया गया था कि एक राजभाषा आयोग की स्थापना की जाएगी जो राष्ट्रपति को संघ की राजकीय प्रयोजनों के लिए भाषा के बारे में सिफारिश करेगा। 1955 में राजभाषा आयोग का गठन किया गया जिसके तहत आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दिया कि विधि के क्षेत्र में हिंदी में समान रूप से काम करने के लिए दो कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं - (1) विधि शब्दावली का विकास; और (2) समस्त अधिनियमों का हिंदी में पुन: अधिनियमन अपनी रिपोर्ट में राजभाषा आयोग ने विधि शब्दावली के निर्माण के साथ हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दावली के विकास के लिए केंद्र और राज्यों में हो रहे प्रयासों में समन्वय स्थापित करने के लिए समुचित प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। परिणामस्वरूप तत्कालीन राष्ट्रपति ने 1960 में विधि विशेषज्ञों का एक स्थायी आयोग बनाने का आदेश पारित किया और तदनुसार 1961 में संघ ने राजभाषा (विधायी) आयोग की स्थापना की। आयोग ने यह निर्णय लिया कि मानक विधि शब्दावली की तैयारी को हिंदी में अधिनियमों के संग्रह के पुन: अधिनियमन के कार्य से अलग न किया जाए। इस प्रकार अधिनियमों का अनुवाद और मानक विधि शब्दावली का निर्माण साथ-साथ चलता रहा।
आयोग ने 1970 में विधि शब्दावली का प्रथम संस्करण तैयार किया जिसमें लगभग 10,000 प्रविष्टियां थीं। आगे चलकर राजभाषा (विधायी) आयोग का कार्य विधि मंत्रालय
के विधायी विभाग में स्थापित राजभाषा खंड को सौंप दिया गया जिसने 1979 में इस शब्दावली का परिवर्धित संस्करण जारी किया| इसके
पश्चात आज तक इसके कुल छ: संस्करण आ चुके हैं जिसमें कुल प्रविष्टियों की संख्या
बढकर लगभग 50,000 हो चुकी है।
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