पारिभाषिक शब्दावली निर्माण संबंधी शुद्धतावादी विचारधारा को 'पुनरुद्धारवादी', 'राष्ट्रीयतावादी', 'संस्कृतवादी', 'प्राचीनतावादी' विचारधारा आदि अन्य अनेक नामों से भी अभिहित किया जाता है। इस वर्ग के लोग भारतीय भाषाओं की समस्त पारिभाषिक शब्दावली संस्कृत भाषा से लेने के पक्ष में हैं। इस विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों का मानना है कि संस्कृत में शब्द-रचना की अपार क्षमता है इसलिए किन्ही अन्य स्रोतों से शब्द-ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। वे यथासाध्य अधिक से अधिक पारिभाषिक शब्दों को प्राचीन संस्कृत वाड्मय से लेना चाहते हैं, किंतु जिन आधुनिक पारिभाषिक शब्दों के लिए संस्कृत में प्रतिशब्द उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, उनके लिए समास पद्धति द्वारा दो या अधिक संस्कृत शब्दों के मेल से, अथवा संस्कृत शब्द में उपसर्ग-प्रत्यय आदि जोड़कर या फिर आवश्यक होने पर नई धातुएँ बनाकर उनमें प्रत्यय-उपसर्ग जोड़कर नए तत्सम शब्द (संस्कृतनिष्ठ पारिभाषिक शब्दावली) निर्मित करने के पक्षधर हैं। डॉ. रघुवीर ने इस दृष्टिकोण का नेतृत्व किया। वे भारतीय शब्द-भंडार को संस्कृतनिष्ठ बनाने के प्रबल समर्थक थे।
यह संप्रदाय पुनरुद्धारवादी
इसलिए कहलाता है क्योंकि इस विचार-दृष्टि वालों ने प्राचीन भारतीय शास्त्रों में
उपलब्ध शब्दों का उद्धार किया, अंग्रेजी के वैज्ञानिक-तकनीकी
शब्दों के समतुल्य नए तत्सम शब्दों की रचना-प्रक्रिया में प्राचीन भाषा संस्कृत के
व्याकरण को साधन बनाते हुए प्राचीन व्याकरणिक पद्धति को अपनाया।
शुद्धतावादी संप्रदाय के प्रमुख
समर्थक डॉ.रघुवीर का अपनी भाषा को विदेशी शब्दों के प्रभाव से मुक्त रखने के प्रति
आग्रह था। वे संसार की अन्य किसी भी भाषा की तुलना में हिंदी के शब्दों में
पारदर्शिता स्वीकार करते थे। उनका कहना था कि संस्कृत भाषा शब्द-निर्माण का अनंत
स्रोत है क्योंकि इसकी 520 धातुओं, 20
उपसर्गों एवं 80 प्रत्ययों की सहायता से लाखों-करोड़ों शब्द
बनाए जा सकते हैं। अपने शुद्धतावादी दृष्टिकोण के आधार पर डॉ. रघुवीर ने 1955 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध कोश ‘A Comprehensive Hindi-English
Dictionary’ में अंग्रेजी शब्दों के प्रतिशब्द दिए हैं और पारिमाषिक
शब्दावली के निर्माण के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या की है।
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