साहित्य की नई गद्य-विधाओं के प्रादुर्भाव के पीछे अनुवाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है। ईसप के फेबल्स, बनयन का द पिल्यिम्स प्रोग्रेस का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद तथा रूपातंरण हुआ। फोर्ट विलियम कॉलेज द्वारा 1803 में प्रकाशित 'द ओरियंटल फेबलिस्ट” ईसप के फेबल्स का ही बांग्ला, हिंदी तथा उर्दू अनुवाद है। मराठी का बाल बोध मुक्तावली (1806) तथा बंगाली नीति कथा (1818) ईसप के फेबल्स का रूपातंरण है।
इस समय में एक महत्वपूर्ण कार्य
हुआ विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य का परस्पर अनुवाद। 1815 से 1819 के बीच राजा राममोहन राय ने वेदान्त ग्रंथ
तथा पांच उपनिषदों का अनुवाद किया जिसका उद्देश्य तत्कालीन समाज को प्राचीन हिंदू धर्म
से परिचित करवाना और समाज सुधार की पृष्ठभूमि तैयार करना था। इसके अतिरिक्त
संस्कृत तथा फारसी से विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचुर अनुवाद कार्य हुआ,
जिसका विवरण आगे दिया जाएगा।
अंग्रेजी तथा फ्रेंच की रचनाओं
का बांग्ला आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ। डेनियल डेफो के रॉबिन्सन क्रूसो का प्रचुर
अनुवाद हुआ | श्यामचरण दास ने 'द फेयर
पेनिटेंट का बांग्ला में अनुतापिनी नभ कामिनी (1856) शीर्षक
से अनुवाद किया। फ्रेंच रचना पॉल एट वर्जीनिया का अंग्रेजी के माध्यम से बांग्ला
में पाल ओ वर्जीनिया इतिहास शीर्षक से अनुवाद हुआ। शैक्सपीयर और मिल्टन अनुवाद एवं
रूपातंरण के माध्यम से भारत में अंगेजी के सर्वप्रिय लेखकों में शुमार किए। शेक्सपीयर
के नाटकों के लगभग सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद एवं रुपांतरण हुए। हरचंद्र घोष
द्वारा मर्चयर ऑफ वेनिस का भानुमति चित्त विलास (1653) शीर्षक
से किया बांग्ला अनुवाद संभवतः पहला भारतीय अनुवाद था। इसी तरह मिल्टन का साहित्य
भी अनुवाद के माध्यम से शिक्षित भारतीयों के लिए यया नहीं रह गया था।
अनुवाद के माध्यम ने ही भारत में आधुनिक साहित्य की नींव रखी। गद्य विधा की शुरुआत हुई। ईसाई मिशनरियों द्वारा करवाए गए अनुवाद तथा फोर्ट विलियम कॉलेज में हो रहे अनुवाद व आधुनिक शिक्षा की शुरुआत ने महसूस किया कि अब साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए पद्य काफी नहीं। धीरे-धीरे बहुत से धार्मिक ग्रंथों का गद्यानुवाद हुआ पाठ्यपुस्तकें गद्य विद्या में लिखी जाती थीं। गद्य के प्रमाण भारत में बहुत पूर्व से मिलने लगते है। अमीर खुसरो के यहां गद्य के नमूने देखे जा सकते है। लेकिन प्रामाणिक रूप से गद्य आधुनिक काल की देन है। राजा राममोहन राय ने वेदान्त और उपनिषदों के अनुवाद में बांग्ला गद्य का परिचय दिया, लेकिन वह गद्य बेहद संस्कृतनिष्ठ है।
भारत में गद्य की ठोस शुरुआत भी
मूलतः विदेशी साहित्य के माध्यम से ही होती है। समाचार पत्नों-पत्रिकाओं का प्रकाशन,
पाठय-पुस्तकें. अनुवाद आदि गद्य के माध्यम से हुए और होते-होते यह
विधा आगे इतनी फली-फूली कि भारतीय साहित्य की पूरी तस्वीर ही बदल गई।
उपन्यास एवं उनके अनुवाद
बाग्ला उपन्यासकार विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के उपन्यास पाथेर
पांचाली (1929) का अंग्रेजी अनुवाद टी. डब्ल्यू क्लार्क एवं
तारापद मुखर्जी ने पाथेर पांचाली : सॉग ऑफ द रोड के नाम से किया। इससे पूर्व
सत्यजीत रे ने इसी नाम से 1955 में फिल्म बनाई, जिसने अपार लोकप्रियता हासिल की। हिंदी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के उपन्यास
गोदान का अंग्रेजी अनुवाद हिंदी के ही एक अन्य बड़े रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद
वात्सयायन अज्ञेय ने किया। गोदान का एक अंग्रेजी अनुवाद गोर्डन सी, रोडरमल ने द गिफ्ट ऑफ अ काव के नाम से अंग्रेजी में किया। अज्ञेय ने अपने अंग्रेजी
अनुवाद में गोदान की कथा के केवल उस भाग को लिया जो गांव तक सीमित था। वस्तुतः यदि
देखा जाए तो लगभग सभी अनुवादकों ने अपने अनुवादों में स्वायत्तता बरती और पूरे
उपन्यास के अनुवाद के स्थान पर उसमें कूछ परिवर्तन किए। मलायलम उपन्यासकार तकषि
शिवशंकर पिल्लै के कालजयी उपन्यास चेम्मीन (1956) का
अंग्रेजी अनुवाद करते समय अनुवादक वी, के. नारायणन मेनन ने
उसके एक-चौथाई भाग को ही कथा रूप में ही लिया। इसी तरह हिंदी के एक बेहद चर्चित
एवं स्वतंत्र भारत की राजनीतिक समस्याओं पर लिखे आंचलिक उपन्यास राग दरबारी'
के अंग्रेजी अनुवाद में भी इसी तरह की छेड़छाड़ की गई। चेम्मीन के
डोगरी सहित कई अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुए।
वर्तमान समय में आधुनिक भारतीय
भाषाओं के साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए कई संस्थाएं काम कर रही हैं जिनमें से
प्रमुख हैं - साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट, भारतीय ज्ञानपीठ आदि। इन संस्थाओं ने प्रचुर मात्रा में भारतीय कालजगी
साहित्य की न केवल पहचान की है अपितु उनका विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी करवाया
है।
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