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छायावाद की अंतर्वस्तु पर विचार कीजिये।

 1) व्यक्ति-स्वातंत्र्य का स्वर

छायावाद बूंद और समुद्र, व्यष्टि और समष्टि या मानव और समाज-दोनों का अपूर्व समन्वय अपने भीतर करता चलता है। खूबी यह है कि व्यक्ति स्वातंत्र्य को प्रेरित करते हुए विश्व बोध में उसका विलयन कर देना छायावाद की सफलतम उपल्लग्ि है। प्रत्येक देशवासी में स्वतंत्रता की भावना, आत्माभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वाधीनता की प्रतिष्ठा- यही सब छायावाद के साहित्यिक, आन्दोलन को जीवन्त बनाते हैं। निराला जब यह कहते हैं- “मैंने मैं शैली अपनाई”- तो यहाँ “मैं” कहकर समूचे युग की पीड़ा को वे अपनी निधि मान कर चलते हैं। प्रसाद जी भी “आँसू' में इसी प्रकार वैयक्तिक विरह को “विश्व-वेदना” में परिणत करके यही कामना करते हैं- “चुन-चुन ले रे कनकन से जगती की सजग व्यथाएँ“ इसी प्रकार पन्‍त, निराला और महादेवी के काव्य में आत्माभिव्यक्ति का यह स्वर कई स्थानों पर देखने को मिलता है। निराला की इन अभिव्यक्तियों को देखिए:

i) मैं अकेला! देखता हूँ आ रही, मेरे दिवस की सान्ध्य बेला।”

ii) “ज्योति निर्झर बह गया है, रेत ज्यों तन रह गया है।”

iii) अभी न होगा मेरा अन्त |”

iv)  “ मैं ही बसंत का अग्रदूत।"

2) रूढ़ियों से मुक्ति का प्रयास

छायावादी काव्य विनत विद्रोह का काव्य है। उसने प्रथम बार पौराणिकता का निषेध किया और यूरोपीय विद्वानों द्वारा थोपे गए इतिहास को नकारकर नया राष्ट्रीय इतिहास निर्मित किया। ये कवि किसी राजनीतिक विचारधारा के अनुगत नहीं रहे, न मार्क्स के, न गांधी के। उनका अपना चिन्तन रहा है और अपनी प्रणाली भी। छायावादी कवि निराला ने हर प्रकार की रूढ़ि पर प्रहार किया और नये विषय, नयी भाषा के साथ नये छंद (मुक्त छंद) का प्रवर्तन भी किया। कवि पन्‍्त ने ठीक ही कहा था- “कट गए छंद के बंध, प्रास के रजत

पाश”। निराला जी का जय घोंष था- “तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा! पत्थर की, निकले फिर गंगा जल धारा।” प्रसाद जी के शब्दों में "पुरातनता का निर्मोक” प्रकृति को एक पल के लिए भी सह्य नहीं है। इसी ध्येय से पन्‍त जी ने यह कामना की- “द्रुत झरो, जगत के जीर्ण पत्र"!


3) प्राकृतिक स्पंदन

छायावादी कविता का प्रकृति से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। प्रकृति इन कवियों के देश- प्रेम और व्यक्ति-स्वातंत्रय की आकांक्षा की पूरक रही है। छायावादी कवियों ने प्रकृति को सर्व सुन्दरी” कहा है। पन्‍त जी के कथनानुसार उन्हें कविता करने की प्रेरणा प्रकृति से मिली है। वास्तव में, ये चारों कवि” निसर्ग” कवि रहे हैं। प्रसाद जी ने अपने एक निबंध प्रकृति सौन्दर्य” में प्रकृति को विलक्षण ईश्वरीय देन कहा है और विश्वात्मा की छाया भी माना जाता है। उनके अनुसार, “यह प्रकृति जो मनुष्य को आत्म चैतन्य की ओर बार-  बार उसका मानवीकरण (नारीकरण) किया है। तुलसीदास” नामक काव्य में उन्होंने प्रकृति के माध्यम से चिल का उदात्तीकरण कराया है। तात्पर्य यह कि प्रकृति छायावादी कविता की सहचरी रही है।


4) गीतात्मक मघुर वेदना

छायावादी कविता सही अर्थों में “आन्तरिक स्पर्श से पुलकित भावों” की कविता है। सृष्टि का चक्र जन्म-मरण, सुख-दुख, मिलन-विरह तथा अश्रु-हास की सीमाओं के बीच अपनी यात्रा तय करता है। कवि की पहचान उसका “वियोगी होना” और “ आह के गीत सृजन करना” ही माना गया है। जीवन के इस पारस-सत्य को छूकर ही इन छायावादी कवियों की काव्य-साधना भी हृदय के अध्यात्म की गंभीर अनुभूति को प्रस्तुत करती रही। हृदय की अमर-अभिव्यक्ति करने वाले इन चारों महाकवियों में महादेवी वेदना के मधुर गीत गाने में सर्वाधिक सफल हुईं और परिणामतः उन्हें “आधुनिक युग की मीरा” भी कहा गया। साधना का दिव्य-दीपक प्रज्ज्यलित करके सदैव-यात्रा में रहने वाली महादेवी- “अचल- पथिक” बन जाती हैं। सत्य के सहज ज्योतिर्मय स्वरूप का अस्तित्व वे सामंजस्य में देखती हैं तो कहती हैं- “सेतु शूलों का बना बांधा विरह-वारीश का जल” और विरह की घड़ियाँ" भी जिस कवयित्री को “मधुर मधु की यामिनी-सी“ प्रतीत होती हैं, सुख-दुःख का यह मेघ-द्युति खेल भी समझ जाती हैं। द्वैत, अद्दैत हो जाता है और वे जीवन के गहनतम प्रकाश को सृष्टि-समष्टि रूप में देखने लगती हैं-

दमकी दिगंत के अधरों पर स्मित की रेखा-सी क्षितिज कोर

आ गए एक क्षण में समीप आलोक तिमिर के दूर कोर,

घुल गया अश्रु में अरुण हास हो गई हार में जय विलीन!

5) नारी विषयक नव्य धारणा

छायावादी काव्य नारी के प्रति नवीन दृष्टि रखता है। नारी के प्रति इन कवियों में न भक्तिकालीन कवियों का तिरस्कार भाव है, और न रीतिकाव्य जैसा कामिक कौतुकी- कदाचार है। इन्होंने द्विवेदी-युगीन परहेजी संस्कार तथा प्रगतिवाद, प्रयोगवाद के यौनाकुल आवेशज्वार से ऊपर उठकर नारी को मानवीय सौन्दर्य की अधिष्ठात्री, मानवीय करुणा की विधात्री अर्थात्‌ जीवन के समस्त शुभ संकेतों की निर्मात्री घोषित किया है। प्रसाद” के मतानुसार तो नारी श्रद्धा का प्रतिरूप ही है-

नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।

पीयूष श्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।

कवि ने नारी को दया, माया, ममता, मधुरिमा, अगाध विश्वास आदि शुभ एवं श्रेयस्कर भावों का प्रतीक घोषित किया है। छायावादी कवियों की दृष्टि में नारी विलास की सहचरी न होकर उच्चतम भूमियों तक ले चलने वाली शक्ति है। पुरुष क्रूरता को मनुष्यता के रूप में परिणत: करने का कार्य नारी शक्ति का ही है। वे कहते हैं

शासन करोगी तुम मेरी क्रूरताओं पर, मानस की माधुरी से”।

6) युगीन सत्य और यथार्थ-अभिव्यक्ति

छायावादी काव्य ने यथार्थ का वह अर्थ नहीं लिया, जिससे लघुत्वकामी दृष्टि अथवा “अधघः प्रेक्षण” का मन्तव्य निकलता है। उनकी दृष्टि में यथार्थ एक व्यापक सत्य-तथ्य है। इन कवियों ने अपनी समकालीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था को खुली दृष्टि से देखा था और भरसक समस्याओं का समाधान भी खोजा था । प्रसाद जी ने “कामायनी” में विगत तथा वर्तमान के साथ-साथ भावी युग जीवन को भी रूपायित करने की चेष्टा की है। निराला की कई कविताएँ, जैसे “वह तोड़ती पत्थर”, “भिक्षुक”, “विधवा, छोड़ दो जीवन यों न मलो, दान” आदि युगीन यथार्थ की उपज हैं। पन्‍त जी ने “युगान्त”, “युगवाणी" और "ग्राम्या” में इस युग-यथार्थ को अभिव्यक्ति दी है। जब वे कहते हैं- यह तो मानव लोक नहीं रे, यह है नरक अपरिचित” तो वहाँ युग का कदु यथार्थ बोल उठता है। इन कवियों का यथार्थ किसी राजनीतिक मतवाद से ग्रस्त नहीं है। वह उनकी व्यापक लोक संवेदना से उत्पन्न है और इनके काव्य के जनाधार का प्रमाण है।

7) राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना

छायावाद राष्ट्रीयता का पोषक रहा है। नवजागरण की उस बेला में अपनी स्वाधीनता के लिए विदेशी शासकों के विरुद्ध सत्याग्रह-पूर्ण संघर्ष करती हुई भारतीय जनता को राष्ट्र के अतीत गौरव, अर्थात्‌ उसकी सांस्कृतिक चेतना से अवगत कराना बहुत आवश्यक था। इसीलिए, प्रसाद जी ने अपने नाटकों में राष्ट्र का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया। उनकी काव्य कृतियों में बौद्ध करुणा से शैवागम तक की अनेक दार्शनिक विचारधाराओं का संदेश है। इसी प्रकार निराला जी में वेदान्त, योग, शाक्तमत, पन्त जी में मार्क्सवाद, अरविन्द दर्शन और गांधीवाद, महादेवी जी में बौद्ध करुणा तथा अद्दैत दर्शन की पर्याप्त अनुगूंज है। भारतीय अध्यात्म के अतिरिक्त इन कवियों ने सामाजिक संचेतना के श्रेष्ठ पक्षों की ओर संकेत किया है और इन सबसे राष्ट्रीय एकता को प्रश्नय दिया है। प्रसाद जी ने तो अपने एक गीत- “हिमालय के आंगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार” में "भारत जय विजय करे” और पन्त जी का प्रसिद्ध गीत- “भारतमाता ग्रामवासिनी” इन कवियों की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की दृष्टि से उल्लेखनीय है। प्रसाद जी ने तो विदेशी यात्री और शत्रु कन्या कार्नेलिया से भारत की वन्दना करायी है। उनका यह गीत राष्ट्रीय चेतना का अनन्य प्रमाण है- ” अरुण यह मधुमय देश हमारा”। इसी प्रकार इस प्रयाण गीत में भी राष्ट्रीयागा का ओजस्वी-तेजस्वी स्वर मुखरित हुआ है-

हिमाद्वि तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती,

स्वयं प्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती।

अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो,

प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।”

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