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डायरी और संस्मरण विधा का अंतर स्पष्ट कीजिए।

जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में किसी तीसरे व्यक्ति को कुछ बताना चाहता है, तब वह 'सस्मरण' लेखन की विधा को अपनाता है। डायरी में लेखक और पाठक एक ही व्यक्ति होता है। वह अपने लिए ही लिखता है, जबकि संस्मरण का कोई पाठक होता है। लेखक अपने से इतर किसी अन्य व्यक्ति को कुछ कहना चाहता है। इस स्तर पर संस्मरण आत्मकथा के करीब होता है। संस्मरण का उद्देश्य होता है। प्रायः वह सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व्यक्ति के जीवन के बारे में कुछ नयी बातें कहना चाहता है। संस्मरण का नायक (विषय) सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण या लोकप्रिय व्यक्ति होता है। आमतौर पर अति सामान्य व्यक्ति का संस्मरण नहीं लिखा जाता । लेकिन ऐसा अनिवार्य भी नहीं है। हाँ, वह व्यक्ति ऐसा होना चाहिए, जिसे तीसरा व्यक्ति (पाठक) भी जानना चाह सकता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रेमचंद, अल्बर्ट आइन्सटाईन, बिरजू महाराज जैसे लोगों पर अनेक संस्मरण मिल सकते हैं। पाठक इनको जानता है, वह इनके बारे में और भी बहुत कुछ जानना चाहता है। इसलिए एक सामान्य आदमी भी इनके बारे में अपने संस्मरण सुना सकता है।

   संस्मरण में लेखक, संस्मरण जिस व्यक्ति के बारे में है और पाठक- ये तीन बिंदु होते हैं। डायरी में लेखक ही पाठक होता है। लेखक अपने बारे में भी डायरी लिख सकता है। इस तरह यह संभव है कि डायरी का विषय भी लेखक स्वयं हो सकता है, पाठक और लेखक तो वह होता ही है।

   'संस्मरण' में लेखक से इतर किसी “व्यक्ति' (नायक) का होना आवश्यक है। सिर्फ अपने बारे में कही गयी बातें संस्मरण की श्रेणी में नहीं आती । संस्मरण का विषय होना अनिवार्य है। 'संस्मरण' में भी आत्माभिव्यक्ति की संभावना होती है। लेखक अपने बारे में भी बीच-बीच में कुछ-कुछ बातें कहता जाता है। दरअसल संस्मरण का विषय दो व्यक्तियों का साझा अनुभव होता है। लेखक और विषय (नायक) जिस बिंदु पर आकर मिलते हैं - उसका वर्णन संस्मरण का 'कथ्य' होता है। लेखक अपने बारे में जो भी कहता है, उसका संबंध प्रस्तुत व्यक्ति से कुछ-न-कुछ होना चाहिए इसी तरह प्रस्तुत व्यक्ति का कुछ-न-कुछ संबंध लेखक से होना चाहिए। जिस व्यक्ति को आप नहीं जानते, उसका संस्मरण लिखने का आपको अधिकार नहीं है। इसी तरह उस व्यक्ति के बारे में आप वही बातें लिख सकते हैं, जिनको आपने स्वयं देखा और महसूस किया है। आप सुनी-सुनायी बातों को संस्मरण में नहीं लिख सकते | आप संस्मरण के द्वारा उस व्यक्ति के बारे में अपनी गवाही देते हैं। समाज में पूर्व में प्रचलित बातों को पुष्ट करते हुए भी, आप संस्मरण लिख सकते हैं या उस व्यक्ति के बारे में आप नयी बातें भी कह सकते हैं। आपका संस्मरण ऐसा तो होना ही चाहिए, जैसा कोई और नहीं लिख सकता। आपकी डायरी आप ही लिख सकते हैं। इसी तरह आपके संस्मरण भी आप ही लिख सकते हैं, कोई दूसरा नहीं लिख सकता। यह निजता संस्मरण और डायरी की अपनी विशेषता है

   संस्मरण में आप कोई गोपनीय रहस्य उद्घाटित करें, ऐसा आवश्यक नहीं है। संस्मरण प्रकाशन के लिए लिखा जाता है। इसलिए उसमें लेखक 'आत्म औचित्य' का ध्यान रख सकता है। किसी मार्मिक प्रकरण में वह अपनी भूमिका के लिए सफाई दे सकता है। इस दृष्टि से संस्मरण डायरी से दूर तथा आत्मकथा के करीब पहुँच जाता है। संस्मरण भी 'आत्मकथा' की तरह स्मृति से लिखा जाता है। इसमें भी कुछ बातें छूट जाती हैं। कुछ बातों को गैर जरूरी मानकर लेखक छोड़ देता है। प्रासंगिक दृष्टि से मूल्यवान बातों को ही वह कहता है। इसलिए इसमें भी अतीत और वतर्मान दोनों काल उपस्थित रहते हैं। लेखक नये जीवन के आलोक में प्राचीन घटनाओं का पुनः स्मरण करता है। तभी तो वह 'स्मरण' है। इसके लिए वह 'डायरी' का सहारा ले सकता है। परंतु उसका कथ्य डायरी से अलग हट जाता है। 'डायरी' का लेखक भी अपनी डायरी में 'संस्मरण” का उपयोग कर सकता है। परंतु उसके कथ्य का उद्देश्य अलग होता है।

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